कर्ण महाभारत का सबसे वीर पात्र था, लेकिन नियति और धर्म के द्वंद्व ने उसे विजय से दूर रखा।
सूर्यदेव के वरदान से जन्मे कर्ण के शरीर पर जन्म के समय ही कवच और कुंडल थे, जो उसे अजेय बनाते थे।
रथ चलाने वाले परिवार में पले कर्ण को बचपन से ही सूतपुत्र कहकर तिरस्कार सहना पड़ा, जिससे भीतर आग जली।
हस्तिनापुर के दरबार में अपमान के बाद दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बनाकर सम्मान दिया और मित्रता निभाने का मोड़ आया।
कर्ण ने शस्त्रविद्या सीखी, लेकिन परशुराम और एक ब्राह्मण के शाप ने युद्ध के निर्णायक क्षण में उसकी शक्ति पर रोक लगाई।
कुंती के सत्य के बावजूद कर्ण ने दुर्योधन के प्रति वचन निभाया और केवल अर्जुन से युद्ध करने का निर्णय लिया।
कर्ण सर्वशक्तिमान था, लेकिन नियति, धर्म और भावनाओं के द्वंद्व ने उसे हार दिलाई; यही उसकी सच्ची त्रासदी थी।