दिवाली पर पटाखों की परंपरा कितनी पुरानी है और इसका भारत में आगाज़ कैसे हुआ, आइए जानते हैं इतिहास की रोशनी में।
प्राचीन काल से भारतीय त्योहारों में रोशनी का इस्तेमाल होता था। घी के दीयों और चूर्ण से उत्सव मनाया जाता था, पटाखों का चलन तब नहीं था।
चीन में पटाखे बुरी आत्माओं को भगाने और सौभाग्य बढ़ाने के लिए जलाए जाते थे। बंगाली बौद्ध धर्मगुरु आतिश दीपांकर ने इसे भारत में लाया।
मुगल काल में आतिशबाजी का चलन बढ़ा। शाहजहां और औरंगजेब के समय विवाह, जन्मदिन और शब-ए-बारात पर पटाखों का इस्तेमाल आम हुआ।
मंगोल और मुगल बारूद और आतिशबाजी की तकनीक भारत लाए, लेकिन शुरुआती प्रयोग अक्सर युद्ध में और बड़े उत्सवों में होते थे।
इतिहासकार मानते हैं कि दिवाली पर आतिशबाजी की परंपरा मुगलों ने शुरू की। अकबर के दरबार में इसे धार्मिक और दैवीय स्तुति माना जाता था।
18वीं-19वीं सदी में बंगाल और अवध के नवाबों ने दुर्गा पूजा और दिवाली पर आतिशबाजी का शानदार आयोजन शुरू किया।