11 मई 1998, दोपहर के 3 बजकर 45 मिनट पर, राजस्थान के पोखरण की तपती रेत के नीचे इतिहास अपनी करवट ले रहा था। उस क्षण भारत सिर्फ एक परीक्षण नहीं कर रहा था, बल्कि अपनी सामरिक आत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहा था।
Atal Bihari Vajpayee Jayanti: 25 दिसंबर के दिन मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रधानमंत्री रहते हुए 1998 में एक ऐसा साहसिक कदम उठाया, जिसने न केवल भारत की सामरिक ताकत बढ़ाई बल्कि दुनिया को भी यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा में आत्मनिर्भर है। इसी दिन भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया, जो देश के लिए आत्मसम्मान और सामरिक संप्रभुता का प्रतीक बन गया।
11 मई 1998: पोखरण में इतिहास रचा गया
11 मई 1998 की दोपहर 3:45 बजे, राजस्थान के पोखरण में भारत ने अपने पहले परमाणु परीक्षण को अंजाम दिया। यह सिर्फ एक परीक्षण नहीं था, बल्कि भारतीय सामरिक शक्ति और आत्मनिर्भरता की एक नई इबारत थी। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में यह कदम वर्षों की योजना और रणनीति का परिणाम था।
बिना किसी विदेशी सहयोग के, अंतरराष्ट्रीय दबाव और खासकर अमेरिका की निगरानी के बावजूद यह परीक्षण सफलतापूर्वक किया गया। उस समय दुनिया के ‘न्यूक्लियर हब’ माने जाने वाले देश भारत पर नजर बनाए हुए थे, ताकि इसे परमाणु शक्ति संपन्न न बनने दिया जाए। लेकिन वाजपेयी ने न केवल तत्कालीन चुनौती का सामना किया, बल्कि भविष्य की सुरक्षा की दृष्टि से यह निर्णय लिया।
कठिन राजनीतिक और प्रशासनिक निर्णय
अटल बिहारी वाजपेयी 25 दिसंबर 1924 को ग्वालियर में जन्मे थे। भारतीय राजनीति में उनका स्थान केवल उनके शब्दों से नहीं, बल्कि उनके साहसिक और दूरदर्शी निर्णयों से भी स्थापित था। 1998 का परमाणु परीक्षण उसी दूरदर्शिता का उदाहरण है। वाजपेयी ने परीक्षण का निर्णय तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय दबाव और आलोचना के बावजूद लिया। यह सिर्फ एक विस्फोट नहीं था, बल्कि भारत के आत्मसम्मान और सामरिक संप्रभुता की घोषणा थी।
1998 में वाजपेयी की सरकार 13 पार्टियों की मिली-जुली सरकार थी। शपथ ग्रहण के कुछ दिनों बाद पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने वाजपेयी से मुलाकात कर कहा था, “सामग्री तैयार है, आप आगे बढ़ सकते हैं। 18 मार्च 1998 को सत्ता में लौटने के बाद, वाजपेयी ने वैज्ञानिकों को परमाणु परीक्षण के लिए हरी झंडी दी। इस दौरान डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम और डॉ. चिदंबरम मुख्य रूप से परीक्षण की तैयारी में शामिल थे। एपीजे अब्दुल कलाम ने सुझाव दिया कि परीक्षण बुद्ध पूर्णिमा के दिन 11 मई 1998 को किया जाए।

ऑपरेशन शक्ति: सुरक्षित और गोपनीय तैयारी
परमाणु परीक्षण का कोड नेम ‘ऑपरेशन शक्ति’ रखा गया। इस प्रोजेक्ट में काम करने वाले वैज्ञानिक रात में काम करते थे और अमेरिकी सैटेलाइट निगरानी से बचने के लिए सुरक्षा उपाय अपनाए गए। साइंटिस्ट्स कभी एक साथ यात्रा नहीं करते थे और उनके कोड नेम रखे गए थे। एपीजे अब्दुल कलाम का कोड नेम था ‘मेजर जनरल पृथ्वीराज’, जबकि चिदंबरम का कोड नेम था ‘नटराज’। भारतीय सेना की 58वीं इंजीनियर्स रेजिमेंट ने ग्राउंड वर्क में पूर्ण सहयोग दिया।
अंततः दोपहर 3:45 बजे पहला बम फोड़ दिया गया। इस परीक्षण ने भारत को परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र का दर्जा दिलाया और दुनिया को यह संदेश दिया कि भारत अपनी सुरक्षा और किसी भी आक्रामकता का जवाब देने में सक्षम है। एपीजे अब्दुल कलाम ने बाद में इंटरव्यू में कहा,
'बहुत प्रेशर था, लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने निर्णय लिया और डीआरडीओ तथा एटॉमिक एनर्जी टीम के साथ परीक्षण को अंजाम दिया। यह भारत की सामरिक ताकत और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है।'
अटल बिहारी वाजपेयी का यह साहसिक कदम न केवल तत्कालीन भारत के लिए महत्वपूर्ण था, बल्कि भविष्य में भी देश की सामरिक नीति और आत्मनिर्भरता के लिए निर्णायक साबित हुआ। उनका यह ‘अटल’ निर्णय भारत को सशक्त, सुरक्षित और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में खड़ा करता है।











