जंगी ऐप, एक एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड प्लेटफॉर्म, अपराधियों और आतंकवादियों के बीच लोकप्रिय हो गया है। यह ऐप मोबाइल नंबर या ईमेल के बिना रजिस्ट्रेशन की सुविधा देता है और मैसेज पढ़ते ही डिलीट हो जाते हैं, जिससे जांच एजेंसियों के लिए ट्रेस करना मुश्किल हो जाता है। पिछले साल पंजाब में आतंकवादियों के मामले में इसका इस्तेमाल सामने आया था।
Jungi App Security Threat: जंगी ऐप अब अपराधियों और नशा तस्करों के लिए प्रमुख डिजिटल प्लेटफॉर्म बन गया है। दिल्ली और पंजाब सहित देश के कई हिस्सों में इसका इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। यह एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड प्लेटफॉर्म रजिस्ट्रेशन के लिए मोबाइल नंबर या ईमेल नहीं मांगता और मैसेज पढ़ते ही डिलीट हो जाते हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे ऐप्स पर निगरानी और साइबर कानूनों को अपडेट करना अब और जरूरी हो गया है, ताकि अपराधियों को ट्रेस किया जा सके।
जंगी ऐप अपराधियों के लिए क्यों है लोकप्रिय
जंगी ऐप एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड प्लेटफॉर्म है, जिसमें रजिस्ट्रेशन के लिए मोबाइल नंबर या ईमेल की जरूरत नहीं पड़ती। इसका मुख्य लाभ यह है कि चैट कोई सर्वर पर स्टोर नहीं होती और मैसेज पढ़ते ही डिलीट हो जाते हैं। इस वजह से जांच एजेंसियों के लिए संदेशों को ट्रेस करना कठिन हो जाता है। ऐसे सुरक्षा फीचर्स इसे नशा तस्करों, आतंकवादियों और अन्य अपराधियों के लिए आकर्षक बनाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगी जैसी ऐप्स का इस्तेमाल बढ़ते अपराध और साइबर सुरक्षा चुनौतियों को दर्शाता है। सरकार ने पहले भी सुरक्षा कारणों से इस तरह की कई ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन उनके खुलासे लगातार होते रहते हैं।

पहले भी विवादों में रही जंगी ऐप
जंगी ऐप पिछले साल दिसंबर में पंजाब के आतंकवादियों के मामले में सुर्खियों में आई थी। उस समय तीन आतंकवादी पुलिस चौकी पर हमला करके फरार हो गए थे, और उनके वीडियो जंगी ऐप पर मिलने के बाद पुलिस ने करीब 800 किलोमीटर दूर उन्हें एनकाउंटर कर ढेर किया था। इस घटना ने साबित किया कि अपराधी और आतंकवादी इस ऐप का इस्तेमाल अपने कार्यों को सुरक्षित रखने के लिए करते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, जंगी ऐप जैसी एंड-टू-एंड एनक्रिप्टेड सेवाओं पर निगरानी बढ़ाना और साइबर सुरक्षा कानूनों को अपडेट रखना अब और जरूरी हो गया है।








