हाई कोर्ट का बड़ा संदेश: न्याय के नाम पर समय की अनिश्चितता स्वीकार्य नहीं

हाई कोर्ट का बड़ा संदेश: न्याय के नाम पर समय की अनिश्चितता स्वीकार्य नहीं

प्रयागराज, 26 दिसंबर २०२५ -  इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने न्यायिक प्रक्रिया में “पर्याप्त अवसर” देने के अर्थ पर अहम टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि इसका मतलब पक्षों को अनिश्चितकाल तक समय देना नहीं है। अदालत ने कहा कि कानून के तहत प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए समय सीमाएँ तय की जाती हैं और उनका पालन होना आवश्यक है।

कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के अंतर्गत पक्षों को किसी विशेष काम के लिए अधिकतम तीन अवसर दिए जा सकते हैं, जब तक कि किसी पक्ष द्वारा पर्याप्त वजह न दी जाए कि उन्हें और समय दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, एक बार आदेश पारित हो जाने के बाद उसी आदेश को दोबारा जारी करना या उसी आदेश को अनंत तक लटकाना न्याय प्रक्रिया की भावना के विपरीत है। अदालत के इस बयान के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि “पर्याप्त अवसर” का तात्पर्य प्रक्रिया को लंबा करने या विवाद को अनिश्चित काल तक खींचने से नहीं है, बल्कि न्यायपालिका द्वारा निर्धारित समय पर पक्षों को न्यायिक सुनवाई में बराबरी से भाग लेने का मौका देना है।

यह टिप्पणी एक विशेष याचिका पर सुनवाई के दौरान आई, जिसमें याचिकाकर्ता ने लंबित प्रक्रियाओं के कारण अधिक समय देने की मांग की थी। हाई कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि यदि किसी पक्ष को किसी निर्णय से असंतोष है, तो वह लागू प्रक्रिया के अनुसार अपील या अन्य कानूनी साधन अपना सकता है। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट संकेत मिला है कि न्यायालय की प्रक्रिया में निर्धारित समय सीमा का पालन अनिवार्य है और “पर्याप्त अवसर” का अर्थ केवल उचित प्रक्रिया के भीतर दिए जाने वाला समय ही है न कि कोई असीमित अवधि।

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