Rangbhari Ekadashi 2026: बाबा विश्वनाथ को चढ़ेगा गुलाल, शुरू होगा रंगोत्सव

Rangbhari Ekadashi 2026: बाबा विश्वनाथ को चढ़ेगा गुलाल, शुरू होगा रंगोत्सव

रंगभरी एकादशी 2026 पर काशी में होली उत्सव की शुरुआत होगी। 27 फरवरी को बाबा विश्वनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित कर श्रद्धालु भगवान से रंग खेलकर होली की अनुमति मांगेंगे। यह परंपरा लगभग 360 साल पुरानी है और शिव-गौरा के मिलन तथा सांस्कृतिक रंगोत्सव का प्रतीक मानी जाती है।

Rangbhari Ekadashi 2026: काशी में 27 फरवरी, 2026 को रंगभरी एकादशी मनाई जाएगी, जब श्रद्धालु बाबा विश्वनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित करेंगे और होली खेलने की अनुमति प्राप्त करेंगे। इस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष पर हरिश्चंद्र घाट में मसाने की होली का आयोजन होगा, जिसमें नागा साधु, किन्नर और स्थानीय श्रद्धालु शामिल होंगे। यह पर्व शिव-गौरा के मिलन और काशी के रंगोत्सव का प्रतीक भी है, जो धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व रखता है।

बाबा विश्वनाथ को चढ़ेगा गुलाल

रंगभरी एकादशी पर काशीवासी बाबा विश्वनाथ को अबीर-गुलाल अर्पित करते हैं। इस दिन श्रद्धालु मंदिर में उमड़ते हैं और भगवान से होली खेलने की अनुमति मांगते हैं। परंपरा के अनुसार पूर्व महंत कुलपति तिवारी के परिवार ने लगभग 360 साल पहले इस रीति की शुरुआत की थी।

यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि काशी की सांस्कृतिक पहचान भी बन गया है। गुलाल अर्पित करने की रस्म के साथ शहर में होली उत्सव की शुरुआत होती है, जो पूरे फाल्गुन मास में चलने वाले त्यौहारों की श्रृंखला की पहली कड़ी है।

रंगभरी एकादशी का महत्व

ज्योतिषार्य और भविष्यवक्ता अनीष व्यास के अनुसार, शुक्रवार, 27 फरवरी 2026 को रंगभरी एकादशी रहेगी। इसे आमलकी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन फाल्गुन शुक्ल पक्ष पर हरिश्चंद्र घाट में मसाने की होली खेली जाती है। इसमें नागा साधु, किन्नर समुदाय और स्थानीय श्रद्धालु शामिल होते हैं।

पौराणिक मान्यता है कि रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ मां गौरा का गौना कराने के लिए ससुराल आते हैं। इस दिन का पर्व शिव और गौरा के मिलन का प्रतीक भी माना जाता है, जो काशी में धार्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

शिव-गौरा के गौना की अनूठी परंपरा

रंगभरी एकादशी पर शिव-गौरा के गौना की परंपरा भी होती है। मान्यता है कि महाशिवरात्रि पर विवाह के बाद माता पार्वती का ‘गौना’ रंगभरी एकादशी पर किया जाता है। इस दिन शिव अपने ससुराल जाते हैं और पूजा-अर्चना के साथ होली उत्सव में हिस्सा लेते हैं।

इस अवसर पर काशी विश्वनाथ मंदिर, तिलभांडेश्वर और गौरी केदारेश्वर मंदिर में विशेष श्रृंगार और पालकी यात्रा निकाली जाती है। यह परंपरा काशीवासी और श्रद्धालुओं के लिए धार्मिक और सांस्कृतिक उत्सव का प्रतीक बन गई है।

काशी में रंगोत्सव का सांस्कृतिक महत्व

रंगभरी एकादशी पर काशी में होली का रंगोत्सव शुरू होता है। यह पर्व न केवल धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक है बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता को भी दर्शाता है। पूरे शहर में इस दिन से फाल्गुन के नौ त्यौहारों और सात वार की परंपराओं का शुभारंभ होता है।

यह पर्व बच्चों, युवा और बुजुर्ग सभी के लिए आकर्षण का केंद्र है। नंगा साधु, पारंपरिक संगीत, नृत्य और होली की रीतियों के माध्यम से काशीवासी अपने ऐतिहासिक और धार्मिक इतिहास को जीवित रखते हैं।

होली और गुलाल का प्रतीकात्मक महत्व

रंगभरी एकादशी पर गुलाल चढ़ाने की परंपरा सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि सामाजिक और धार्मिक संदेश भी देती है। यह भगवान और श्रद्धालुओं के बीच आत्मीयता और भक्ति को दर्शाती है। साथ ही, यह काशी के होली उत्सव की शुरुआत का संकेत है, जो पूरे फाल्गुन मास में रंगों और उत्साह का प्रतीक बनता है।

शिव और गौरा के मिलन का पर्व होने के कारण यह त्यौहार पारिवारिक और सामाजिक जीवन में खुशहाली और मंगलकामना का संदेश भी देता है। श्रद्धालु इस दिन मंदिरों में पूजा अर्चना करने के साथ होली के रंग खेलकर आनंदित होते हैं।

रंगभरी एकादशी पर स्थानीय और वैश्विक श्रद्धालु

काशी विश्वनाथ मंदिर पर दुनियाभर से श्रद्धालु आते हैं। इस दिन श्रद्धालु अबीर-गुलाल अर्पित करते हुए भगवान से होली खेलने की अनुमति मांगते हैं। शहर में हर उम्र के लोग और विशेष समुदाय जैसे नागा साधु और किन्नर रंगोत्सव में भाग लेते हैं।

इस अवसर पर शहर की गलियों, घाटों और मंदिरों में भक्तिमय वातावरण रहता है। रंगभरी एकादशी केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह काशी की सांस्कृतिक पहचान और पर्यटन के लिहाज से भी आकर्षक होती है।

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