Strait of Hormuz में बाधा की खबरों से वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मच गई है। दुनिया के करीब 20% कच्चे तेल की आपूर्ति इसी मार्ग से होती है। रूस ने दावा किया है कि भारत ने वैकल्पिक तेल खरीद में नई दिलचस्पी दिखाई है।
India-Russia Relations: मध्य पूर्व में जारी संघर्ष के बीच रणनीतिक रूप से बेहद अहम Strait of Hormuz के बंद होने की खबरों ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में हलचल मचा दी है। यह संकीर्ण जलमार्ग फारस की खाड़ी को दुनिया के बड़े बाजारों से जोड़ता है और वैश्विक कच्चे तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा यहीं से गुजरता है। ऐसे में अगर यहां लंबे समय तक बाधा बनी रहती है तो तेल की कीमतों में तेज उछाल आना तय माना जा रहा है।
अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हालिया हमलों के बाद क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है। जवाबी कार्रवाई के संकेतों के बीच होर्मूज जलडमरूमध्य में आवाजाही प्रभावित हुई है। इसका असर भारत समेत कई बड़े आयातक देशों पर पड़ सकता है।
रूस का दावा, भारत ने दिखाई नई दिलचस्पी
इस संकट के बीच रूस ने दावा किया है कि भारत ने रूसी कच्चे तेल की खरीद में नई दिलचस्पी दिखाई है। रूस के उपप्रधानमंत्री Alexander Novak ने मॉस्को में सरकारी टीवी Rossiya TV से बातचीत में कहा कि उन्हें भारत की ओर से नए संकेत मिल रहे हैं।
नोवाक रूस के ऊर्जा क्षेत्र की देखरेख करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में कई देश वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की तलाश कर रहे हैं। होर्मूज के प्रभावित रहने की स्थिति में रूस जैसे बड़े उत्पादक देशों की भूमिका और अहम हो सकती है।
क्यों अहम है होर्मूज जलडमरूमध्य
होर्मूज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में गिना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर और फिर वैश्विक समुद्री मार्गों से जोड़ता है। खाड़ी के प्रमुख तेल उत्पादक देश इसी रास्ते से कच्चा तेल और तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG का निर्यात करते हैं।

अगर इस मार्ग में लंबे समय तक व्यवधान रहता है तो भारत, चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे बड़े आयातक देशों की ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी आ सकती है, जिसका असर सीधे पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ता है।
भारत के लिए क्या है चुनौती
भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में होर्मूज में किसी भी तरह की नाकेबंदी भारत के लिए चिंता का विषय है। अगर खाड़ी देशों से आपूर्ति बाधित होती है तो भारत को वैकल्पिक स्रोतों पर निर्भर होना पड़ेगा।
रूस पहले से ही भारत को रियायती दरों पर कच्चा तेल सप्लाई करता रहा है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी प्रतिबंधों के चलते रूस ने एशियाई बाजारों की ओर रुख बढ़ाया था। अब मौजूदा संकट में भारत और रूस के बीच नई ऑयल डील की संभावना पर चर्चा तेज हो गई है।
हालांकि किसी औपचारिक समझौते की घोषणा अभी नहीं हुई है, लेकिन रूस की ओर से आए बयान ने बाजार में अटकलों को बढ़ा दिया है।
यूरोप भी बदल सकता है रुख
रूस के उपप्रधानमंत्री नोवाक ने यह भी संकेत दिया कि अगर ऊर्जा संकट गहराता है तो यूरोपीय संघ अपने फैसलों पर पुनर्विचार कर सकता है। यूरोपीय देशों ने रूस के हाइड्रोकार्बन आयात में कटौती का फैसला लिया था, लेकिन मौजूदा संकट उन्हें नरमी बरतने पर मजबूर कर सकता है।
ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की प्राथमिकता होती है। ऐसे में वैश्विक संकट के समय राजनीतिक फैसलों में बदलाव संभव है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले हफ्तों में यूरोप और एशिया के देश किस तरह अपनी ऊर्जा रणनीति तय करते हैं।










