करीब 90 साल पुरानी रडार तकनीक आज भी आधुनिक युद्ध में सबसे महत्वपूर्ण निगरानी प्रणाली बनी हुई है। यह तकनीक दुश्मन के विमान, मिसाइल और ड्रोन को दूर से पहचानने और ट्रैक करने में मदद करती है। लगातार तकनीकी सुधारों के कारण रडार सिस्टम पहले से अधिक सटीक और शक्तिशाली बन गए हैं।
Radar Technology in Modern Warfare: लगभग एक सदी पुरानी रडार तकनीक आज भी दुनिया की आधुनिक सेनाओं के लिए सबसे भरोसेमंद निगरानी प्रणाली मानी जाती है। 1930 के दशक में विकसित इस तकनीक का इस्तेमाल सबसे पहले बड़े स्तर पर United Kingdom ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया था। स्कॉटिश वैज्ञानिक Robert Watson-Watt के प्रयासों से विकसित रडार सिस्टम रेडियो तरंगों की मदद से दुश्मन के विमान, ड्रोन और मिसाइल की दूरी व दिशा का पता लगाता है। यही कारण है कि आधुनिक एयर डिफेंस और सैन्य निगरानी में रडार आज भी केंद्रीय भूमिका निभा रहा है।
रडार तकनीक की शुरुआत कैसे हुई
रडार तकनीक का विकास 1930 के दशक में हुआ था, जब दुनिया धीरे-धीरे युद्ध की स्थिति की ओर बढ़ रही थी। उस समय देशों को दुश्मन के विमानों की पहले से पहचान करने के लिए एक ऐसी तकनीक की जरूरत महसूस हुई जो दूर से ही खतरे का पता लगा सके। इसी आवश्यकता ने रडार तकनीक के विकास को तेज किया।
रडार के शुरुआती विकास का श्रेय मुख्य रूप से स्कॉटिश भौतिक वैज्ञानिक Robert Watson-Watt को दिया जाता है। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान United Kingdom ने बड़े पैमाने पर रडार का इस्तेमाल किया, जिससे दुश्मन के विमानों की जानकारी पहले ही मिल जाती थी और रक्षा तैयारियां समय रहते की जा सकती थीं। इसके बाद यह तकनीक दुनिया की लगभग हर सेना का अहम हिस्सा बन गई।
कैसे काम करता है रडार सिस्टम
रडार का पूरा नाम Radio Detection and Ranging है। यह तकनीक रेडियो तरंगों के जरिए किसी वस्तु की दूरी, दिशा और गति का पता लगाने में मदद करती है। रडार सिस्टम में एक ट्रांसमीटर होता है जो लगातार रेडियो सिग्नल हवा में भेजता है।
जब ये सिग्नल किसी वस्तु जैसे विमान, ड्रोन या मिसाइल से टकराकर वापस लौटते हैं, तो रडार सिस्टम उस सिग्नल का विश्लेषण कर लक्ष्य की सटीक स्थिति का अनुमान लगा लेता है। आधुनिक रडार सिस्टम इतने एडवांस हो चुके हैं कि वे एक साथ कई लक्ष्यों को ट्रैक कर सकते हैं और उनकी गति व दिशा की जानकारी भी तुरंत दे सकते हैं।

स्टील्थ तकनीक के दौर में भी क्यों जरूरी है रडार
आज कई देशों ने स्टील्थ फाइटर जेट और स्टील्थ ड्रोन विकसित किए हैं जिन्हें रडार से बचने के लिए डिजाइन किया जाता है। इसके बावजूद रडार तकनीक पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुई है। वैज्ञानिक लगातार नई पीढ़ी के रडार सिस्टम विकसित कर रहे हैं जो स्टील्थ तकनीक का भी पता लगा सकते हैं।
लो-फ्रीक्वेंसी रडार और मल्टी-स्टेटिक रडार जैसी आधुनिक तकनीकें स्टील्थ लक्ष्यों की पहचान करने में सक्षम मानी जाती हैं। यही वजह है कि आधुनिक एयर डिफेंस नेटवर्क में रडार की भूमिका पहले से भी अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
दुनिया के सबसे एडवांस रडार सिस्टम
वर्तमान समय में कई देशों ने अत्याधुनिक रडार सिस्टम विकसित किए हैं जो सैकड़ों से लेकर हजारों किलोमीटर दूर तक लक्ष्यों को ट्रैक कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर रूस का S-500 Prometheus और अमेरिका का AN/TPY-2 radar दुनिया के सबसे आधुनिक रडार सिस्टम में गिने जाते हैं।
भारत भी इस क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। देश के पास उन्नत निगरानी क्षमताओं वाला Passive Coherent Location Radar मौजूद है, जो बिना सक्रिय सिग्नल भेजे भी स्टील्थ विमान का पता लगाने में सक्षम माना जाता है।











