Sheetala Ashtami 2026: कब है शीतला अष्टमी? जानिए बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा

Sheetala Ashtami 2026: कब है शीतला अष्टमी? जानिए बासी भोजन का भोग लगाने की परंपरा

होली के बाद Sheetala Ashtami का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व Holika Dahan के आठवें दिन और Chaitra Krishna Ashtami तिथि को आता है।विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे Rajasthan, Madhya Pradesh, Uttar Pradesh, और Haryana में यह पर्व श्रद्धापूर्वक मनाया जाता है।

Sheetala Ashtami: भारत में धार्मिक और सांस्कृतिक त्योहारों का विशेष महत्व है, जिनमें शीतला अष्टमी का पर्व भी शामिल है। यह पर्व विशेष रूप से उत्तर भारत के राज्यों जैसे राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और बिहार में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। शीतला अष्टमी का त्योहार चैत्र महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है और इसे होली के बाद मनाया जाता है।

शीतला अष्टमी 2026 की तारीख और समय

इस वर्ष शीतला अष्टमी 11 मार्च 2026 को है। अष्टमी तिथि की शुरुआत 11 मार्च की रात 01:54 बजे से होगी और यह तिथि 12 मार्च को सुबह 04:19 बजे तक रहेगी। इस दिन शीतला माता की पूजा और व्रत का आयोजन किया जाएगा। पूजा के लिए सुबह 6:36 बजे से शाम 6:27 बजे तक का मुहूर्त शुभ माना गया है।शीतला अष्टमी का व्रत आमतौर पर सप्तमी तिथि से शुरू होने वाले विशेष व्यंजन तैयार करने की परंपरा के साथ जुड़ा होता है।

शीतला अष्टमी पर बासी भोजन का भोग

शीतला माता की पूजा में एक अनोखी और विशेष परंपरा है—बासी भोजन का भोग। आमतौर पर पूजा में ताजा भोजन ही भोग के रूप में लगाया जाता है, लेकिन शीतला अष्टमी में पिछले दिन तैयार किए गए व्यंजन जैसे पुरी, पकौड़ी, कढ़ी, मीठे चावल, हलवा आदि का भोग माता को अर्पित किया जाता है। इस परंपरा के अनुसार, अष्टमी के दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता। 

सप्तमी तिथि पर ही सभी व्यंजन तैयार कर लिए जाते हैं और अगले दिन, शीतला अष्टमी पर इन्हें भोग के रूप में माता को अर्पित किया जाता है। बासी भोजन का भोग लगाने के कारण इसे कई स्थानों पर ‘बसौड़ा’ या ‘बासोड़ा’ के नाम से भी जाना जाता है। भक्त मानते हैं कि शीतला माता बासी और ठंडे भोजन को अधिक पसंद करती हैं, और इस भोग से माता की प्रसन्नता और आशीर्वाद प्राप्त होते हैं।

शीतला अष्टमी का धार्मिक महत्व

धार्मिक दृष्टि से, शीतला माता को रोग-शोक और विशेष रूप से चेचक और त्वचा रोगों से रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। ‘शीतला’ शब्द का अर्थ होता है शीतलता देने वाली, यानी माता अपने भक्तों के घर-परिवार में स्वास्थ्य, शांति और सुख-समृद्धि बनाए रखने वाली देवी हैं। लोक मान्यता के अनुसार, शीतला अष्टमी पर माता की पूजा और बासी भोजन का भोग लगाने से:

  • घर में रोग और बीमारी नहीं आती।
  • परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।
  • बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होती है।
  • विशेष रूप से चेचक और संक्रामक रोगों से रक्षा होती है।

इसके अलावा, यह पर्व सामाजिक और पारिवारिक एकता को भी बढ़ावा देता है। लोग अपने पड़ोसियों और रिश्तेदारों के साथ भोग साझा करते हैं और स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की कामना करते हैं।

उत्तर भारत में शीतला अष्टमी की परंपराएं

उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में शीतला अष्टमी को अलग-अलग रीति-रिवाजों से मनाया जाता है।

  • राजस्थान और मध्य प्रदेश: लोग विशेष पूजा स्थल पर माता की प्रतिमा या तस्वीर के सामने बासी भोजन अर्पित करते हैं।
  • हरियाणा और उत्तर प्रदेश: घर-घर चूल्हा न जलाने और बासी भोजन अर्पित करने की परंपरा है।
  • बासी भोग साझा करना: कई परिवार पड़ोसियों और दोस्तों के साथ बासी भोजन साझा करते हैं, जिससे सामुदायिक भावना और सहयोग बढ़ता है।

शीतला अष्टमी का पर्व न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है।

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