अजमेर की विश्वप्रसिद्ध Ajmer Sharif Dargah में आगामी उर्स से पहले tension बढ़ता जा रहा है। दरगाह कमेटी और खादिमों (दर्गाह के पारंपरिक सेवकों) के बीच हालिया license order को लेकर टकराव तेज हो गया है।
राजस्थान: अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की विश्वप्रसिद्ध दरगाह में इन दिनों एक नया विवाद गहराता जा रहा है। दरगाह कमेटी के हालिया आदेश के बाद खादिमों और कमेटी के बीच टकराव तेज हो गया है। यह विवाद दरगाह में जियारत करवाने के लिए लाइसेंस अनिवार्य किए जाने के फैसले से जुड़ा है, जिसे खादिम समुदाय ने सख्त शब्दों में खारिज कर दिया है। दरगाह कमेटी ने 1 दिसंबर को इस संबंध में एक विज्ञापन जारी किया था, जिसमें 5 जनवरी 2026 को आवेदन की अंतिम तिथि तय की गई है। आदेश के अनुसार अब जियारत कराने वाले खादिमों को लाइसेंस लेना और इसके लिए आवेदन करना अनिवार्य होगा।
दरगाह कमेटी का आदेश
दरगाह कमेटी ने 1 दिसंबर को एक नोटिस जारी किया, जिसकी अंतिम तारीख 5 जनवरी 2026 निर्धारित की गई। नोटिस के अनुसार, अब जियारत करवाने वाले खादिमों को लाइसेंस लेना अनिवार्य होगा और इसके लिए आवेदन करना जरूरी होगा। Nazim Bilal Khan ने इस निर्णय की वजह बताते हुए कहा कि यह कदम security and convenience of visitors (jayarins) के लिए लिया गया है।
उन्होंने दावा किया कि कई खादिमों का criminal background सामने आया है और लाइसेंस प्रक्रिया के तहत उनका background verification किया जाएगा। इसके अलावा, उन्होंने बताया कि अजमेर प्रशासन दरगाह के अंदर और आसपास illegal encroachments हटाने की कार्रवाई कर रहा है, जिनमें से अधिकांश कब्जे खादिमों द्वारा किए गए बताए जा रहे हैं।
खादिमों का विरोध

इस आदेश के खिलाफ खादिमों ने मोर्चा खोल दिया है। दरगाह की Anjuman Committee के सचिव Syed Sarwar Chishti ने कहा कि यह फैसला unfair और एकतरफा है। उनका कहना है, “दरगाह किसी के निजी अधिकार में नहीं है। यह Khwaja Garib Nawaz की दरगाह है। सदियों से खादिम ही इसके असली सेवक रहे हैं। किसी कमेटी के तुगलकी फरमान को हम स्वीकार नहीं करेंगे।
सरवर चिश्ती ने आगे आरोप लगाया कि कमेटी जमीनी स्तर पर अतिक्रमण और सुरक्षा के मामलों में कोई ठोस कार्रवाई नहीं करती। उन्होंने कहा कि कैमरे लगाने की बातें होती हैं, लेकिन ground monitoring नहीं होती। उनका यह भी कहना है कि लाइसेंस जैसी कोई प्रक्रिया खादिमों से नहीं ली जाएगी।
उर्स के मद्देनजर सुरक्षा की चिंता
इस विवाद का असर जल्द ही शुरू होने वाले Urs 2025 पर पड़ सकता है। 17 दिसंबर से उर्स शुरू होने जा रहा है, जिसमें हर साल लाखों जियारिन अजमेर पहुंचते हैं। दरगाह कमेटी का मानना है कि लाइसेंस प्रक्रिया visitor safety और orderly management सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है।बिलाल खान ने कहा, यह निर्णय Supreme Court और केंद्र सरकार की अनुमति के बाद ही लागू किया गया। लाइसेंस प्रक्रिया केवल सुरक्षा और सुविधा के दृष्टिकोण से है।
वर्तमान में दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अड़े हुए हैं। खादिम इसे अपने heritage rights पर हमला मान रहे हैं, जबकि कमेटी सुरक्षा और नियमों के पालन पर जोर दे रही है। प्रशासन भी स्थिति पर लगातार नजर रख रहा है ताकि उर्स के दौरान किसी तरह की law and order problem न पैदा हो।











