प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने से रोकने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता।
Ajmer Sharif Chadar Controversy: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अजमेर शरीफ दरगाह पर औपचारिक रूप से चादर चढ़ाने से रोकने की मांग वाली याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने साफ शब्दों में कहा कि यह मामला न्यायिक हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता और इस पर कोर्ट कोई टिप्पणी नहीं करेगा। कोर्ट के इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि प्रधानमंत्री द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा पर फिलहाल कोई संवैधानिक या न्यायिक रोक नहीं लगाई जा सकती।
यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों को लेकर देशभर में बहस और कानूनी विवाद लगातार सामने आ रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस याचिका के खारिज होने का अजमेर शरीफ दरगाह से जुड़े किसी भी लंबित सिविल सूट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
किन जजों की बेंच ने सुनाया फैसला
इस अहम याचिका पर सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने की। बेंच ने याचिका को प्रारंभिक स्तर पर ही सुनवाई योग्य मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यह ऐसा विषय नहीं है, जिस पर संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत हस्तक्षेप किया जाए।
बेंच ने स्पष्ट किया कि कोर्ट का काम हर सामाजिक या राजनीतिक विवाद में दखल देना नहीं है। जब किसी विषय के लिए कानून में वैकल्पिक रास्ते मौजूद हों, तो सीधे सुप्रीम कोर्ट आना उचित नहीं माना जा सकता।
क्या थी याचिका और क्या मांग की गई थी
यह याचिका जितेंद्र सिंह और अन्य की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील वरुण सिन्हा ने अदालत में पक्ष रखा। याचिका में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अजमेर शरीफ दरगाह पर चादर चढ़ाने की परंपरा को चुनौती दी गई थी।

याचिका में कहा गया था कि यह परंपरा 1947 में देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने शुरू की थी और तब से यह बिना किसी स्पष्ट कानूनी या संवैधानिक आधार के जारी है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि किसी धार्मिक स्थल या धार्मिक व्यक्ति को राज्य प्रायोजित औपचारिक सम्मान देना संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को राज्य प्रायोजित सम्मान पर सवाल
याचिका में केवल प्रधानमंत्री की चादर चढ़ाने की परंपरा ही नहीं, बल्कि इस्लामिक सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती को दिए जा रहे राज्य प्रायोजित सम्मान, आधिकारिक संरक्षण और प्रतीकात्मक मान्यता को भी चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि केंद्र सरकार और उसकी विभिन्न एजेंसियां लगातार इस परंपरा को निभा रही हैं, जिससे एक विशेष धार्मिक पहचान को राज्य का समर्थन मिलता दिखाई देता है। उनका तर्क था कि यह धर्मनिरपेक्षता की भावना के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कहा – यह न्याय योग्य मुद्दा नहीं
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने साफ शब्दों में कहा, “अदालत इस विषय पर कोई टिप्पणी नहीं करेगी, क्योंकि यह न्याय योग्य मुद्दा नहीं है।” कोर्ट ने माना कि प्रधानमंत्री द्वारा किसी धार्मिक स्थल पर जाना या वहां किसी परंपरा का पालन करना कार्यपालिका का विषय है, न कि न्यायपालिका का।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में न्यायिक संयम जरूरी है। हर ऐसे कदम को अदालत में चुनौती देना, जो कार्यपालिका के विवेक से जुड़ा हो, संविधान की व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।
शिव मंदिर से जुड़ा सिविल सूट और कोर्ट की टिप्पणी
सुनवाई के दौरान वकील वरुण सिन्हा ने यह भी बताया कि ट्रायल कोर्ट में एक सिविल सूट लंबित है, जिसमें दावा किया गया है कि अजमेर शरीफ दरगाह एक प्राचीन शिव मंदिर के अवशेषों पर बनाई गई थी। इस तर्क के आधार पर याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को भी स्वीकार नहीं किया। बेंच ने स्पष्ट किया कि रिट याचिका खारिज होने का उस लंबित सिविल सूट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
CJI की स्पष्ट सलाह – सिविल कोर्ट में जाएं
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं को साफ शब्दों में कहा, “आप जाएं और सिविल सूट में उचित राहत मांगें।” कोर्ट ने यह संकेत दिया कि अगर किसी पक्ष को किसी धार्मिक स्थल की ऐतिहासिक स्थिति को लेकर आपत्ति है, तो उसके लिए सिविल कोर्ट ही उचित मंच है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि वह तथ्यों के विवाद या ऐतिहासिक दावों की जांच के लिए सही मंच नहीं है, खासकर तब, जब वह मामला पहले से किसी निचली अदालत में लंबित हो।











