अप्रैल में ट्रंप का चीन दौरा तय, शी जिनपिंग से फोन बातचीत में अहम मुद्दों पर की चर्चा

अप्रैल में ट्रंप का चीन दौरा तय, शी जिनपिंग से फोन बातचीत में अहम मुद्दों पर की चर्चा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की फोन बातचीत से दोनों देशों के रिश्तों में नई गर्माहट दिखी। ट्रंप ने अप्रैल में बीजिंग दौरे की पुष्टि की और दोनों नेताओं ने ट्रेड, ताइवान और सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा की।

World Update: अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप और चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग के बीच हुई फोन कॉल ने दोनों देशों के रिश्तों में एक नया मोड़ जोड़ दिया है। इस बातचीत के बाद ट्रंप ने दावा किया कि चीन संग अमेरिका के रिश्ते “बहुत मजबूत” हैं और उन्होंने अप्रैल में बीजिंग आने की पुष्टि की है। दोनों नेताओं की यह बातचीत टैरिफ़ विवाद थमने के बाद पहली उच्च-स्तरीय चर्चा थी, जिसमें कई संवेदनशील मुद्दों पर भी बात हुई।

अप्रैल में बीजिंग दौरे की पुष्टि

ट्रंप ने कहा कि वह अप्रैल में बीजिंग की यात्रा करेंगे और उन्होंने शी जिनपिंग को अगले साल स्टेट विज़िट के लिए अमेरिका आने का निमंत्रण दिया है। यह पहल दोनों देशों के बीच फिर से संवाद बढ़ाने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है। ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा कि चीन के साथ उनके रिश्ते “बहुत मजबूत” हैं और दोनों देशों के बीच हुए एग्रीमेंट को बनाए रखने में लगातार प्रोग्रेस हो रही है।

ट्रेड और कृषि खरीद पर चर्चा

फोन कॉल को “बहुत अच्छी” बताते हुए ट्रंप ने कहा कि बातचीत में चीन की ओर से अमेरिकी सोयाबीन और अन्य कृषि उत्पादों की खरीद बढ़ाने पर चर्चा हुई। इसके साथ ही दोनों ने गैर-कानूनी फेंटानिल के फ्लो को कम करने जैसे मुद्दों पर भी बात की। ट्रंप ने यह भी दोहराया कि बड़ी पिक्चर पर फोकस करते हुए दोनों देश आगे बढ़ सकते हैं।

ताइवान मुद्दे पर चीन का स्पष्ट रुख

चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, बातचीत के दौरान शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि ताइवान का मेनलैंड चीन में वापस आना युद्ध के बाद बने अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर का आवश्यक हिस्सा है। यह बयान ऐसे समय में आया है जब हाल ही में जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने कहा था कि यदि चीन ताइवान के खिलाफ कोई कदम उठाता है, तो जापानी सेना भी शामिल हो सकती है। ताइवान एक self-governing आइलैंड है, जिसे बीजिंग चीन का हिस्सा मानता है।

ताइवान पर अमेरिकी स्थिति

जापान के हालिया बयान के बाद बीजिंग ने उसकी आलोचना की है और दोनों देशों के रिश्ते और बिगड़ गए हैं। दूसरी ओर, अमेरिका ने ताइवान की sovereignty पर कोई स्पष्ट पक्ष नहीं लिया है, लेकिन ताइवान पर फ़ोर्स के इस्तेमाल का विरोध करता है। अमेरिकी कानून के अनुसार, अमेरिका ताइवान की सुरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराने को बाध्य है।

ट्रंप ने ताइवान मामले में सामरिक अस्पष्टता बनाए रखी है कि क्या वह युद्ध की स्थिति में अमेरिकी सैनिक भेजेंगे। उनके प्रशासन ने ताइवान को अपना defence बजट बढ़ाने की सलाह दी है। इसी महीने ताइवान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि उसे ट्रंप प्रशासन ने USD 330 मिलियन के फ़ाइटर जेट पार्ट्स की बिक्री की मंजूरी का आधिकारिक नोटिफ़िकेशन दिया है। बीजिंग ने तुरंत इस कदम का विरोध करते हुए कहा कि यह One-China प्रिंसिपल का गंभीर उल्लंघन है।

दोनों नेताओं की बातचीत में यूक्रेन संकट भी शामिल रहा। चीनी पक्ष के अनुसार, शी ने कहा कि इस संकट का समाधान जड़ से होना चाहिए। यह मुद्दा अमेरिका और चीन दोनों के लिए भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है, खासकर रूस के साथ चीन के संबंधों और पश्चिमी देशों के रुख को देखते हुए।

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