बंटी और चाँद की सीढ़ी: बच्चों की कल्पना और समझदारी की प्यारी कहानी

बंटी और चाँद की सीढ़ी: बच्चों की कल्पना और समझदारी की प्यारी कहानी

बंटी छह साल का एक बहुत ही जिज्ञासु बच्चा था। उसे खिलौनों से ज़्यादा आसमान पसंद था। उसे लगता था कि चंदा मामा रात में अकेले होते हैं और उन्हें खेलने के लिए किसी दोस्त की ज़रूरत है। एक पूर्णिमा की रात, जब चाँद बहुत बड़ा और चमकीला दिख रहा था, बंटी ने ठान लिया कि आज वह चाँद के पास जाकर ही रहेगा।

कहानी

उस रात आसमान बिल्कुल साफ़ था। पूरा चाँद चांदी की थाली जैसा चमक रहा था। बंटी अपनी छत पर लेटा हुआ उसे देख रहा था। उसे लगा कि चाँद उसके घर के पास वाले नीम के पेड़ के ठीक ऊपर अटका हुआ है।

बंटी ने सोचा, 'अगर मैं छत की मुंडेर पर चढ़ जाऊँ और उसके ऊपर एक सीढ़ी लगा दूँ, तो मैं आसानी से चाँद को छू लूँगा। फिर मैं उसे नीचे उतार लाऊँगा और हम दोनों लूडो खेलेंगे।'

घर में सब सो रहे थे। बंटी धीरे से उठा। वह स्टोररूम में गया और वहाँ से एक पुरानी लकड़ी की सीढ़ी घसीटते हुए छत पर ले आया। सीढ़ी भारी थी, लेकिन बंटी का हौसला उससे भी भारी था।

उसने सीढ़ी को दीवार के सहारे लगाया। लेकिन जब वह चढ़ा, तो देखा कि चाँद अभी भी बहुत दूर था। 'अरे! यह तो पास नहीं आया,' बंटी ने सोचा।

उसने इधर-उधर देखा। उसे छत के कोने में एक पुराना स्टूल और कुछ खाली गत्ते के डिब्बे दिखाई दिए। बंटी ने एक खतरनाक योजना बनाई। उसने सीढ़ी के ऊपर स्टूल रखा (जो कि बहुत मुश्किल था) और स्टूल के ऊपर डिब्बा रखने की कोशिश करने लगा।

वह जुगाड़ की बनाई अपनी इस अजीब 'मीनार' पर चढ़ने लगा। हवा चल रही थी और उसकी बनाई सीढ़ी हिल रही थी। बंटी का ध्यान सिर्फ़ चमकते हुए चाँद पर था। उसने अपना नन्हा हाथ ऊपर बढ़ाया और अपनी उंगलियाँ फैलाने लगा, जैसे वह चाँद को पकड़ने वाला हो।

'बस थोड़ा सा और... चंदा मामा, मैं आ रहा हूँ!' वह बुदबुदाया।

तभी पीछे से एक भारी आवाज़ आई, 'बंटी! यह क्या कर रहे हो?'

बंटी हड़बड़ा गया और उसका पैर फिसल गया। गनीमत यह रही कि उसके दादाजी ने, जो रात को टहलने ऊपर आए थे, दौड़कर उसे थाम लिया। स्टूल और डिब्बे धड़ाम से नीचे गिर गए।

दादाजी ने बंटी को गोद में उठाया और सुरक्षित ज़मीन पर खड़ा किया। वे गुस्से में नहीं, बल्कि डरे हुए थे। 'बेटा, तुम गिर सकते थे! इतनी रात को यह सब क्या तमाशा है?'

बंटी रोने जैसा मुँह बनाकर बोला, 'दादू, मुझे चंदा मामा चाहिए। वह देखो, वह इतना पास है, लेकिन मैं वहाँ तक पहुँच ही नहीं पा रहा। मेरी सीढ़ी छोटी पड़ गई।'

दादाजी उसकी मासूमियत देखकर मुस्कुरा दिए। उन्होंने बंटी के सिर पर हाथ फेरा और बोले, 'बेटा, चाँद तक जाने के लिए लकड़ी की सीढ़ी नहीं, रॉकेट चाहिए होता है। वह बहुत दूर है।'

बंटी उदास हो गया। 'तो क्या मैं चंदा मामा के साथ कभी नहीं खेल पाऊंगा?'

दादाजी ने कुछ सोचा और उनकी आँखों में चमक आ गई। वे बोले, 'रुको, मेरे पास एक जादुई तरीका है चाँद को नीचे लाने का।'

दादाजी नीचे गए और रसोई से एक बड़ी सी परात (थाली) में पानी भरकर लाए। उन्होंने उस परात को छत के बीचों-बीच रख दिया। पानी जब स्थिर हो गया, तो उसमें पूर्णिमा का पूरा चाँद एकदम साफ़ दिखाई देने लगा।

दादाजी ने बंटी को बुलाया और कहा, 'देखो बंटी, तुम्हारी सीढ़ी तो वहाँ नहीं पहुँच पाई, लेकिन मैंने चाँद को तुम्हारे लिए यहाँ नीचे बुला लिया।'

बंटी ने पानी में देखा। चाँद वहीं था, पानी के अंदर तैरता हुआ। बंटी ने खुश होकर पानी में हाथ डाला और चाँद की परछाई को पकड़ने की कोशिश की। पानी हिल गया और चाँद भी हिलने लगा।

बंटी हँसने लगा, 'देखो दादू! चंदा मामा को गुदगुदी हो रही है!'

उस रात बंटी को समझ आ गया कि कुछ चीज़ें दूर से ही अच्छी लगती हैं और उन्हें पाने के लिए सीढ़ी की नहीं, बल्कि समझदारी की ज़रूरत होती है। उसने लकड़ी की सीढ़ी हटा दी और पानी में तैरते अपने दोस्त चाँद के साथ देर तक खेलता रहा।

सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'ज़िद और जोखिम उठाने से बेहतर है कि हम अपनी बुद्धि का प्रयोग करें। जो चीज़ें हमारी पहुँच से दूर हैं, उन्हें देखने और समझने का नज़रिया बदलकर हम उनका आनंद ले सकते हैं। हर चीज़ को मुट्ठी में कैद करना ज़रूरी नहीं होता।'

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