गोवा क्लब फायर कांड की जांच रिपोर्ट, प्रशासनिक तंत्र पर उठे सवाल

गोवा क्लब फायर कांड की जांच रिपोर्ट, प्रशासनिक तंत्र पर उठे सवाल

गोवा के अर्पोरा नाइट क्लब अग्निकांड की मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट में गंभीर प्रशासनिक लापरवाही सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार ट्रेड लाइसेंस खत्म होने के बावजूद क्लब संचालित होता रहा, जिससे यह हादसा हुआ और 25 लोगों की मौत हुई।

Goa Club Fire: उत्तरी गोवा के अर्पोरा इलाके में स्थित ‘बिर्च बाय रोमियो लेन’ नाइट क्लब में हुए भीषण अग्निकांड को लेकर अब जो मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट सामने आई है, उसने पूरे प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह हादसा सिर्फ एक आग की घटना नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही सिस्टमेटिक फेल्योर का नतीजा बताया जा रहा है। जांच में साफ हुआ है कि जिस क्लब में 25 लोगों की जान गई, उसका ट्रेड लाइसेंस मार्च 2024 में ही खत्म हो चुका था, इसके बावजूद क्लब धड़ल्ले से चल रहा था और प्रशासन आंख मूंदे बैठा रहा।

मजिस्ट्रियल जांच में क्या सामने आया

चार सदस्यीय मजिस्ट्रियल जांच समिति की रिपोर्ट में स्थानीय पंचायत, गोवा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और गोवा कोस्टल जोन मैनेजमेंट अथॉरिटी की गंभीर लापरवाहियां उजागर हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक क्लब संचालन की प्राथमिक जिम्मेदारी स्थानीय पंचायत की थी, लेकिन पंचायत ने अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया।

जांच में यह भी कहा गया है कि प्रशासनिक अधिकारियों की मिलीभगत के बिना इतने लंबे समय तक नियमों की अनदेखी संभव नहीं थी। क्लब के खिलाफ कार्रवाई के आदेश जारी तो किए गए, लेकिन उन्हें लागू करने में जानबूझकर देरी की गई।

2024 में खत्म हो चुका था ट्रेड लाइसेंस

जांच रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि क्लब का ट्रेड लाइसेंस मार्च 2024 में ही समाप्त हो गया था। नियमों के अनुसार, लाइसेंस खत्म होने के बाद किसी भी व्यावसायिक गतिविधि को तुरंत रोका जाना चाहिए था।

इसके बावजूद न तो परिसर को सील किया गया और न ही क्लब का संचालन बंद कराया गया। पंचायत ने डिमोलिशन यानी ढहाने का आदेश जारी किया था, लेकिन स्टे लगने से पहले उपलब्ध समय में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। रिपोर्ट में इसे गंभीर प्रशासनिक चूक बताया गया है।

वर्षों से चल रही अवैध गतिविधियां

जांच में यह भी सामने आया है कि जिस संपत्ति पर यह क्लब संचालित हो रहा था, वह कोई नई संरचना नहीं थी। यह संपत्ति वर्ष 1996 से अस्तित्व में है और यहां पहले भी दो रेस्टोरेंट चल चुके थे।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि मौजूदा क्लब को नियमों से छूट मिल सकती थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्षों से इस इलाके में अवैध गतिविधियों को नजरअंदाज किया जाता रहा, जिससे एक खतरनाक मिसाल कायम हो गई।

इको-सेंसिटिव जोन में निर्माण

न्यायिक आयोग की जांच में यह भी खुलासा हुआ है कि क्लब का निर्माण इको-सेंसिटिव जोन और साल्ट पैन इलाके में किया गया था। ऐसे क्षेत्रों में निर्माण के लिए बेहद सख्त नियम होते हैं, लेकिन यहां उन सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया।

सबसे गंभीर बात यह है कि ऑक्यूपेंसी सर्टिफिकेट के बिना ही निर्माण और संचालन किया जा रहा था। इसका मतलब है कि भवन की सुरक्षा, फायर सेफ्टी और अन्य जरूरी मानकों की कभी सही जांच ही नहीं हुई।

शिकायतों के बावजूद जारी होते रहे NOC

जांच रिपोर्ट के अनुसार, सबसे बड़ा सवाल यह है कि बार-बार शिकायतें मिलने के बावजूद पंचायत और संबंधित विभागों ने नो ऑबजेक्शन सर्टिफिकेट यानी NOC कैसे जारी किए।

क्लब को ट्रेड लाइसेंस, एक्साइज लाइसेंस, फूड सेफ्टी लाइसेंस और गोवा प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति दी गई थी। इन सभी अनुमतियों के पीछे पंचायत और सरकारी विभागों की भूमिका अब संदेह के घेरे में है।

कोस्टल जोन अथॉरिटी पर भी सवाल

गोवा कोस्टल जोन मैनेजमेंट अथॉरिटी भी इस पूरे मामले में जांच के दायरे में है। रिपोर्ट के मुताबिक कोस्टल रेगुलेशन जोन उल्लंघन और अवैध निर्माण को लेकर दो लिखित शिकायतें दर्ज कराई गई थीं। इसके बावजूद न तो निर्माण रोका गया और न ही किसी तरह की प्रभावी कार्रवाई की गई। यह लापरवाही सीधे तौर पर हादसे की जिम्मेदारी तय करती है।

दो शिकायतें, लेकिन कोई एक्शन नहीं

रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि प्रशासन को दो बार लिखित शिकायतें मिली थीं, जिनमें अवैध निर्माण और नियमों के उल्लंघन की जानकारी दी गई थी।

इसके बावजूद संबंधित अधिकारियों ने कार्रवाई करने के बजाय फाइलों को दबाए रखा। इस निष्क्रियता ने अंततः एक बड़े हादसे को जन्म दिया, जिसमें 25 लोगों की जान चली गई।

अग्निकांड की भयावह रात

अरपोरा गांव में छह दिसंबर की रात जब यह नाइट क्लब आग की चपेट में आया, तब वहां बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। आग इतनी तेजी से फैली कि लोगों को बाहर निकलने का मौका तक नहीं मिला। इस दर्दनाक हादसे में 25 लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हुए। यह घटना पूरे गोवा के लिए एक झटका साबित हुई।

सिस्टमेटिक फेल्योर का नतीजा

मजिस्ट्रियल जांच रिपोर्ट में बार-बार इस बात पर जोर दिया गया है कि यह हादसा किसी एक गलती का नतीजा नहीं, बल्कि सिस्टमेटिक फेल्योर का परिणाम है। स्थानीय पंचायत से लेकर राज्य स्तरीय एजेंसियों तक, हर स्तर पर नियमों की अनदेखी की गई। अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी को टाला जा सकता था।

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