बॉलीवुड की दिग्गज एक्ट्रेस माधुरी दीक्षित ने अपने करियर के शुरुआती दिनों के अनुभव साझा किए हैं, जब फिल्मी सेट पर आज जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं। उन्होंने बताया कि 1980 और 1990 के दशक में कलाकारों और तकनीकी टीम को बेहद सीमित संसाधनों में काम करना पड़ता था।
एंटरटेनमेंट न्यूज़: आज के समय में जहां फिल्मी सेट पर वैनिटी वैन, आरामदायक इंतजाम और आधुनिक तकनीक आम बात हो चुकी है, वहीं एक दौर ऐसा भी था जब कलाकारों और तकनीकी टीम को बेहद सीमित सुविधाओं में काम करना पड़ता था। बॉलीवुड की दिग्गज एक्ट्रेस माधुरी दीक्षित ने अपने शुरुआती फिल्मी दिनों को लेकर आईएएनएस से खुलकर बातचीत की।
उन्होंने बताया कि कैसे 1980 और 1990 के दशक में फिल्म इंडस्ट्री आज की तरह संगठित नहीं थी और कलाकारों को कई तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। सेट पर सुविधाओं की कमी, लंबे शूटिंग घंटे और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत और समर्पण से सफलता हासिल की।
वैनिटी वैन की कमी और खुले में तैयारी
आईएएनएस से बातचीत में माधुरी दीक्षित ने कहा, "उस समय फिल्मों की शूटिंग आज जैसी आरामदायक नहीं हुआ करती थी। हमारे पास वैनिटी वैन नहीं होती थी, सिर्फ काला छाता होता था। कलाकारों को कभी-कभी जंगल जैसी जगहों पर जाकर तैयार होना पड़ता था। ठंड, धूप और मौसम की मार झेलते हुए शूट करना आम बात थी।
उन्होंने बताया कि ऊटी या अन्य खुले और दुर्गम स्थानों पर शूटिंग के दौरान कलाकार और तकनीकी टीम एक साथ काम करते थे। हेयरड्रेसर और मेकअप आर्टिस्ट भी शॉल ओढ़कर ठंड से बचते थे। माधुरी ने कहा, आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूं, तो उस समय की कठिनाइयां साफ दिखाई देती हैं। लेकिन वहीं टीम भावना इतनी मजबूत थी कि सभी लोग एक-दूसरे का सहयोग करते थे और काम का आनंद लेते थे। सभी का जुनून फिल्म को बेहतरीन बनाने के लिए होता था।

फिल्ममेकिंग के तरीके में बदलाव
माधुरी ने बताया कि आज की फिल्म इंडस्ट्री पहले की तुलना में काफी प्रोफेशनल और संगठित हो गई है। उन्होंने कहा, "मैं अपने करियर की पहली फिल्म 'अबोध' से लेकर हाल ही में रिलीज हुई फिल्म 'मिसेज देशपांडे' तक के सफर को देखूं तो अब की इंडस्ट्री में स्क्रिप्ट पहले से मिल जाती है, शूटिंग शेड्यूल तय होता है और सेट पर वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं मौजूद होती हैं। कलाकार हर शॉट के बाद आराम कर सकते हैं या शांति से तैयारी कर सकते हैं।"
1980 और 1990 के दशक में निर्देशकों के साथ काम करना अलग अनुभव था। माधुरी ने कहा, पहले इंडस्ट्री काफी हद तक अव्यवस्थित थी। केवल कुछ ही निर्माता और निर्देशक व्यवस्थित तरीके से काम करते थे, जैसे यश चोपड़ा, बी.आर. चोपड़ा, सुभाष घई और राजश्री प्रोडक्शंस। बाकी जगहों पर परिस्थितियों के अनुसार काम चलता था।
माधुरी ने यह भी बताया कि पहले कलाकारों को कुछ ही मिनटों में सीन शूट करना होता था, जबकि आज किरदार की तैयारी के लिए पूरा समय मिलता है। पहले कलाकारों को धूप में छाते के नीचे बैठकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। आज की सुविधाओं और तकनीक से कलाकारों का काम आसान और पेशेवर हो गया है।
माधुरी ने स्पष्ट किया कि उनके शुरुआती दिनों की कठिनाइयां किसी मजबूरी की वजह से नहीं थीं, बल्कि काम के प्रति जुनून और समर्पण का परिणाम थीं। उन्होंने कहा, वह लाइफस्टाइल बन चुकी थी और उस समय कोई यह महसूस नहीं करता था कि वे बड़ा त्याग कर रहे हैं। सभी का उद्देश्य सिर्फ फिल्म को बेहतर बनाना था।











