नीतीश कुमार ने दो बार विधानसभा चुनाव हारने के बावजूद MLC कोटे के माध्यम से लगातार मुख्यमंत्री बने। उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और राज्य के सामाजिक-आर्थिक विकास में योगदान उन्हें विशेष बनाता है।
Patna: बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक नाम ही नहीं बल्कि एक संस्था की तरह हैं। वे दो बार विधानसभा चुनाव हार चुके हैं, फिर भी 2006 से लगातार MLC कोटे के माध्यम से मुख्यमंत्री पद पर बने हुए हैं। उनका लंबा राजनीतिक अनुभव और राज्य के विकास में योगदान उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। नीतीश कुमार ने बिहार को सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाओं की शुरुआत की है।
विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार की भागीदारी
नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत विधानसभा चुनावों से की थी। 1977 में उन्होंने हरनौत विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद 1980 में भी उन्होंने उसी सीट से चुनाव लड़ा और फिर से हार गए। 1985 में हरनौत सीट से उन्होंने पहली बार जीत हासिल की और 1995 में दूसरी बार निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने सीधे विधानसभा चुनावों में भाग नहीं लिया और अपना ध्यान राष्ट्रीय स्तर की राजनीति और प्रशासनिक कार्यों पर केंद्रित किया।
केंद्र की राजनीति में भूमिका

विधानसभा चुनावों से बाहर रहने के बाद भी नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति में बने रहे। वे कुल 6 बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए, जिसमें 1989, 1991, 1996, 1998, 1999 और 2004 शामिल हैं। इस दौरान उन्होंने केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पद संभाले, जिनमें कृषि मंत्री और रेल मंत्री के पद प्रमुख रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उनका योगदान केंद्रीय स्तर पर बिहार और देश के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना गया।
MLC कोटे से मुख्यमंत्री बनना
2005 में जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने, उन्होंने विधान परिषद का विकल्प चुना। इस कोटे के माध्यम से मुख्यमंत्री बनने का फायदा यह हुआ कि वे चुनावी प्रक्रिया में समय बर्बाद किए बिना सीधे प्रशासन पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे। 2006 में वे पहली बार विधान परिषद के सदस्य बने और इसके बाद 2012, 2018 और 2024 में उन्होंने लगातार MLC कोटे से सदस्यता हासिल की। इस निरंतरता ने उन्हें बिहार में प्रशासनिक स्थिरता प्रदान की।
बिहार विधान परिषद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 171 के तहत कार्य करता है। यह राज्य की द्विसदनीय विधायिका का ऊपरी सदन है, जिसमें कुल 75 सदस्य होते हैं। विधान परिषद का मुख्य उद्देश्य विधायी प्रक्रिया में संतुलन और जाँच सुनिश्चित करना है। यहां विशेषज्ञता और विविध प्रतिनिधित्व के माध्यम से प्रशासक अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकते हैं।
कैसे चुने जाते हैं विधान परिषद के सदस्य
विधान परिषद में सदस्य अलग-अलग कोटे से चुने जाते हैं। इसमें एक तिहाई सदस्य विधानसभा सदस्यों द्वारा निर्वाचित होते हैं, जबकि एक तिहाई सदस्य स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं। इसके अलावा, एक बारहवां भाग स्नातकों द्वारा और एक बारहवां भाग शिक्षकों द्वारा चुना जाता है। शेष एक छठवां भाग राज्यपाल द्वारा कला, साहित्य, विज्ञान और अन्य क्षेत्रों के विशेषज्ञों को मनोनीत किया जाता है। यह प्रणाली प्रशासन में विशेषज्ञता और विविधता सुनिश्चित करती है।











