रामायण के एक अनोखे प्रसंग में युद्ध से पहले रावण ने स्वयं श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया। त्रेता युग में राम ने माता सीता की खोज में लंका पहुँचा और विजय सुनिश्चित करने के लिए यज्ञ कराया। रावण, जो महान शिव भक्त और विद्वान पंडित थे, ने अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए राम को ‘तथास्तु’ कहकर आशीर्वाद दिया।
Ramayan Story: युद्ध से पहले रावण ने स्वयं श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया, यह प्रसंग त्रेता युग के दौरान लंका में हुआ। राम माता सीता की खोज में अपनी वानर सेना के साथ पहुँचे और विजय सुनिश्चित करने हेतु यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ को संपन्न करने के लिए रावण, जो महान शिव भक्त और विद्वान पंडित थे, ने निमंत्रण स्वीकार किया और अपने धर्म और कर्तव्य का पालन करते हुए राम को आशीर्वाद दिया। इस अद्भुत कथा से स्पष्ट होता है कि धर्म, कर्तव्य और नैतिकता जीवन में सर्वोपरि हैं।
यज्ञ कराने का विचार और रावण की भूमिका
त्रेता युग में भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया था। इस युग में राम ने बुराई पर अच्छाई की जीत स्थापित करने के लिए लंकापति रावण का वध किया। कथा के अनुसार, जब राम माता सीता की खोज में अपनी वानर सेना के साथ लंका के पास पहुँचे, तब उन्हें यह विचार आया कि भगवान शिव के आशीर्वाद और विजय के लिए यज्ञ कराया जाए।
यज्ञ के सफलतापूर्वक संपन्न होने के लिए विद्वान पंडित की आवश्यकता थी। उस समय रावण स्वयं एक महान शिव भक्त और विद्वान पंडित थे। राम जी ने रावण को अपने यज्ञ के लिए निमंत्रण भेजा। रावण ने शत्रु होने के बावजूद इस निमंत्रण को स्वीकार किया और यज्ञ संपन्न कराया।

रावण का आशीर्वाद और विजय
यज्ञ संपन्न होने के बाद राम ने रावण से युद्ध में विजय के लिए आशीर्वाद माँगा। रावण ने ‘तथास्तु’ कहकर राम को आशीर्वाद दे दिया। यह आशीर्वाद अद्भुत इसलिए था क्योंकि रावण को ज्ञात था कि राम ही उसका अंत करेंगे, फिर भी उसने अपने धर्म और कर्तव्य के अनुसार यज्ञ संपन्न किया।
कुछ शास्त्रों में यह भी वर्णित है कि रावण को इस बात का पूर्ण ज्ञान नहीं था कि यज्ञ का उद्देश्य उसके खिलाफ युद्ध में विजय प्राप्त करना है। फिर भी उसने धर्म का पालन करते हुए अपने सर्वोत्तम क्षमता से यज्ञ संपन्न किया। इसके बाद युद्ध के दौरान राम ने रावण का अंत किया और धर्म की जीत सुनिश्चित की।
धर्म, कर्तव्य और अद्भुत सत्य
इस प्रसंग से स्पष्ट होता है कि रावण केवल एक शक्तिशाली शासक नहीं था, बल्कि धर्म और कर्तव्य के प्रति अत्यंत निष्ठावान भी था। उसने अपने व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठकर यज्ञ किया और राम को आशीर्वाद दिया। यह घटना न केवल रामायण की कथा में एक अनोखा मोड़ है, बल्कि यह हमें सिखाती है कि धर्म और कर्तव्य का पालन जीवन में सर्वोपरि होना चाहिए।








