राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक Mohan Bhagwat देशभर के दौरे पर हैं। इस दौरान उनके भाषण और सवाल-जवाब चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। ये यात्राएं संघ के शताब्दी वर्ष के तहत पहले से तय की गई थीं।
नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत इस समय देशभर के दौरे पर हैं। यह दौरा संघ के शताब्दी वर्ष के तहत आयोजित किया गया है, जिसमें भागवत स्वयं संघ की विचारधारा और कार्यक्रमों के बारे में विस्तार से बता रहे हैं। इस दौरान उनके भाषण और सवाल-जवाब चर्चा में हैं, विशेषकर जाति, धर्म और मुस्लिम समुदाय के साथ संघ के रिश्ते को लेकर।
जाति और नेतृत्व
अक्सर सवाल उठता है कि संघ के प्रमुख ब्राह्मण ही क्यों होते हैं। मोहन भागवत ने इस पर स्पष्ट किया कि संघ की शुरुआत ऐसे समाज में हुई थी जहां ब्राह्मणों की संख्या अधिक थी। इसलिए शुरुआती कार्यकर्ता और संस्थापक अधिकतर ब्राह्मण थे। भागवत के अनुसार, संघ में किसी पद या जिम्मेदारी का निर्धारण जाति के आधार पर नहीं, बल्कि काम, समर्पण और नेतृत्व क्षमता के आधार पर होता है। संघ में विभिन्न जातियों के लोग नेतृत्व में शामिल हैं और सरसंघचालक का चयन आपसी विश्वास और सहमति से होता है।
भागवत ने कहा कि भारत में जातीय तनाव और विषमता तब पैदा होती है जब लोग खुद को एक राष्ट्र और मातृभूमि की संतान के रूप में नहीं देखते। उनका कहना है कि हिंदू होने का भाव केवल धर्म नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और राष्ट्रीय एकता के लिए जरूरी है।उन्होंने जोर देकर कहा कि समाज में पिछड़े वर्गों को आगे लाना और सभी के बीच सद्भाव बनाए रखना महत्वपूर्ण है। जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करना किसी एक संगठन या सरकार का काम नहीं है, बल्कि समाज के हर व्यक्ति का प्रयास होना चाहिए।
धर्म परिवर्तन और घर वापसी
मोहन भागवत ने मुस्लिम समुदाय और ‘घर वापसी’ के मुद्दे पर भी अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट किया। उनका कहना है कि भारत के सभी मुस्लिमों के पूर्वज हिंदू थे। उन्होंने बाहर से नहीं आकर धर्म बदला। भागवत ने जोर देकर कहा कि किसी को भी धर्म बदलने के लिए दबाव, लालच या छल का इस्तेमाल करना गलत है। अगर कोई व्यक्ति स्वेच्छा से हिंदू धर्म में लौटना चाहता है, तो उसे रोकना नहीं चाहिए। ऐसे लोगों की जिम्मेदारी हिंदू समाज पर होती है कि उन्हें अपनाया जाए।
यह बात अक्सर विवादित रही है। कुछ मुस्लिम नेताओं ने कड़ी आपत्ति जताई, लेकिन भागवत ने स्पष्ट किया कि उनका बयान केवल स्वेच्छा से लौटने वालों के संदर्भ में था, जबरन घर वापसी का जिक्र नहीं था।

संघ में मुस्लिम और अन्य समुदाय
सवाल उठता है कि क्या संघ की शाखाओं में मुस्लिम शामिल हो सकते हैं। भागवत के अनुसार, शाखा में शामिल होने वालों को जाति या धर्म से नहीं देखा जाता, बल्कि केवल हिंदू के रूप में देखा जाता है। संघ का दृष्टिकोण है कि भारत में रहने वाले सभी लोग सांस्कृतिक रूप से हिंदू हैं, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।भागवत ने याद दिलाया कि महापुरुष जैसे स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरविंद ने भी इसी विचारधारा की पुष्टि की थी।
मोहन भागवत से यह सवाल भी पूछा गया कि क्या संघ भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करना चाहता है और तिरंगे की जगह भगवा झंडा लहराना चाहता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत स्वभावतः हिंदू राष्ट्र है, और इसे घोषित करने की आवश्यकता नहीं। भागवत का कहना है कि भारत में कभी किसी पंथ या धर्म की धार्मिक स्वतंत्रता को समाप्त नहीं किया जाएगा। संघ की सोच के अनुसार, सेकुलरिज्म को केवल सम्प्रदाय तटस्थता के रूप में समझा जाना चाहिए।
RSS का शताब्दी अभियान देशभर में विभिन्न मुद्दों पर जागरूकता फैलाने का प्रयास है। भागवत ने कहा कि संघ का कोई विरोधी नहीं है। उनके अनुसार, समाज में दो ही श्रेणियां हैं – एक जो संघ के साथ हैं और दूसरी जो आने वाले समय में साथ आ सकते हैं।












