जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर सावलकोट, रैटल और सेलाल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट भारत की ऊर्जा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को मजबूत करेंगे। ये परियोजनाएं बिजली उत्पादन, जल प्रबंधन और स्थानीय विकास में अहम भूमिका निभाएंगी।
New Delhi: जम्मू एवं कश्मीर में चिनाब नदी पर चल रही जल विद्युत परियोजनाओं को आगे बढ़ाने का फैसला भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने हाल ही में सावलकोट परियोजना की समीक्षा की और इसे 800 मेगावॉट बिजली उत्पादन का प्राथमिक लक्ष्य देने के निर्देश दिए। इस परियोजना से न केवल स्थानीय आबादी को स्थिर बिजली मिलेगी, बल्कि पूरे उत्तर भारत की ऊर्जा मांगों में भी संतुलन आएगा।
सावलकोट, रैटल और सेलाल जैसी परियोजनाएँ केवल बिजली उत्पादन केंद्र नहीं हैं। ये चिनाब नदी के जल भंडारण, नियंत्रण और प्रबंधन के अत्याधुनिक अवसंरचना केंद्र हैं। ऊर्जा उत्पादन के साथ-साथ ये परियोजनाएं जम्मू एवं कश्मीर की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को भी मजबूत करेंगी।
NHPC प्रोजेक्ट्स पर केंद्रीय मंत्री की समीक्षा
केंद्रीय मंत्री मनोहर लाल खट्टर ने समीक्षा के दौरान राष्ट्रीय जलविद्युत निगम (NHPC) द्वारा चलाए जा रहे अन्य प्रोजेक्टों जैसे सेलाल पावर प्रोजेक्ट और रैटल हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट पर भी विशेष ध्यान दिया। रैटल परियोजना में डैम कंक्रीटिंग कार्य का शिलान्यास किया गया और अधिकारियों से समयबद्ध और गुणवत्ता नियंत्रित तरीके से कार्य पूरा करने पर जोर दिया गया।
साथ ही, सेलाल परियोजना में जमा हुई तलछट को हटाने के निर्देश भी दिए गए ताकि जलाशय की भंडारण क्षमता अधिकतम हो और पानी का पूरा उपयोग सुनिश्चित किया जा सके। इस दिशा में काम होने से जल प्रबंधन और बिजली उत्पादन क्षमता दोनों बढ़ेंगी।
पाकिस्तान की आपत्तियों को नकारा गया

मंत्री खट्टर ने स्पष्ट किया कि इन परियोजनाओं के लिए पाकिस्तान की कोई आपत्ति स्वीकार्य नहीं होगी। उन्होंने इंडस वॉटर ट्रिटी (1960) का हवाला देते हुए कहा कि अब भारत पश्चिमी नदियों के जल का उपयोग अपने राष्ट्रीय हित, उद्योग और ऊर्जा सुरक्षा के लिए करेगा। उन्होंने यह भी सुनिश्चित किया कि परियोजनाओं में किसी भी अवैध तत्व या ओवर ग्राउंड वर्कर (OGW) को शामिल नहीं होने दिया जाएगा और सभी गतिविधियां कानूनी शासन और राष्ट्रीय हित के अनुरूप होंगी।
ऊर्जा सुरक्षा के साथ ही रणनीतिक लाभ
जम्मू एवं कश्मीर में बड़े जल विद्युत प्रोजेक्टों को आगे बढ़ाने का मतलब सिर्फ बिजली उत्पादन नहीं है। यह कदम चीन और पाकिस्तान जैसी पड़ोसी शक्तियों के साथ भौगोलिक और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने का संकेत भी है। पानी का नियंत्रण और ऊर्जा उत्पादन भारत को सुरक्षा और राजनीतिक मजबूती प्रदान करेंगे।
इन परियोजनाओं के माध्यम से न केवल ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित होगी, बल्कि संभावित राजनीतिक और सैन्य चुनौतियों का सामना करने की क्षमता भी बढ़ेगी। इसके साथ ही, क्षेत्र में रोजगार और औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि होगी, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी बल मिलेगा।
सिंधु जल संधि बदलाव
पिछले दशकों तक भारत ने संयम दिखाया और सिंधु जल संधि के तहत पश्चिमी नदियों का उपयोग सीमित किया। इस संयम का फायदा पाकिस्तान ने उठाया और अपनी कृषि, बिजली उत्पादन और सीमा सुरक्षा में इसे रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया।
अब भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि सिंधु जल संधि के तहत मिले अधिकारों का पूरा उपयोग किया जाएगा। सावलकोट, रैटल और सेलाल परियोजनाओं के माध्यम से भारत जलाशयों की क्षमता बढ़ा रहा है, गाद हटाकर नियंत्रण सुदृढ़ कर रहा है और रन ऑफ द रिवर तकनीक के भीतर रहकर अधिकतम लाभ प्राप्त कर रहा है।
जम्मू एवं कश्मीर में इन परियोजनाओं के असर केवल बिजली तक सीमित नहीं हैं। बिजली आने से उद्योग और रोजगार बढ़ेंगे, जिससे अलगाववादी राजनीति कमजोर होगी। स्थानीय आबादी के लिए स्थिर बिजली और रोजगार का मतलब है बेहतर जीवन स्तर और आर्थिक विकास।
इसके अलावा, ऊर्जा उत्पादन की क्षमता पूरे उत्तर भारत की बिजली आपूर्ति में योगदान देगी और देश की कुल ऊर्जा आत्मनिर्भरता को मजबूत करेगी। भविष्य में किसी भी ऊर्जा संकट या प्राकृतिक आपदा का सामना करने में भी यह परियोजनाएं अहम साबित होंगी।












