सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि POCSO (Protection of Children from Sexual Offences) अधिनियम का कुछ मामलों में दुरुपयोग किया जा रहा है, खासतौर पर वैवाहिक विवादों और किशोर-किशोरियों के आपसी सहमति वाले संबंधों से जुड़े मामलों में।
नई दिल्ली: भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने मंगलवार को POCSO Act (Protection of Children from Sexual Offences Act) के दुरुपयोग को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि यह कानून बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने के लिए बनाया गया था, लेकिन हाल के वर्षों में इसका उपयोग कई मामलों में वैवाहिक विवादों और किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों में अनुचित तरीके से किया जा रहा है।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना (Justice BV Nagarathna) और जस्टिस आर. महादेवन (Justice R. Mahadevan) की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि इस कानून के प्रावधानों के प्रति लड़कों और पुरुषों में कानूनी जागरूकता फैलाना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गलतफहमी और दुरुपयोग की स्थितियाँ कम हों।
POCSO के प्रावधानों का गलत इस्तेमाल चिंता का विषय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार यह देखा गया है कि POCSO के तहत केस ऐसे किशोर-युवाओं पर भी दर्ज कर दिए जाते हैं, जो आपसी सहमति से रिश्ते में होते हैं। अदालत ने कहा कि इस तरह के मामलों से न केवल निर्दोष युवकों का भविष्य प्रभावित होता है, बल्कि असली पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया भी जटिल बन जाती है।
बेंच ने स्पष्ट किया, POCSO अधिनियम एक बहुत महत्वपूर्ण कानून है, लेकिन इसके प्रावधानों का दुरुपयोग वैवाहिक विवादों और किशोरों के सहमति वाले संबंधों में बढ़ रहा है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि युवाओं, विशेषकर लड़कों में, इस कानून के उद्देश्य और सीमाओं को लेकर पर्याप्त समझ हो।
याचिका में क्या कहा गया?
यह सुनवाई एक जनहित याचिका पर की गई, जिसमें मांग की गई थी कि देश में बलात्कार से संबंधित दंडात्मक प्रावधानों और POCSO अधिनियम के बारे में आम जनता को संवेदनशील बनाया जाए। याचिका में कहा गया है कि देश को महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिक सुरक्षित बनाने के लिए शिक्षा, जनजागरण और कानूनी समझ को समानांतर रूप से मजबूत करने की जरूरत है।

याचिका दायर करने वाले सीनियर वकील आबाद हर्षद पोंडा (Abad Harshad Ponda) ने दलील दी कि जनता, विशेषकर युवाओं को यह पता होना चाहिए कि निर्भया कांड (2012) के बाद कानूनों में कौन-कौन से कठोर बदलाव किए गए हैं और उनका सही इस्तेमाल कैसे होना चाहिए।
शिक्षा मंत्रालय और CBFC को नोटिस
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, शिक्षा मंत्रालय, सूचना और प्रसारण मंत्रालय, और सेंसर बोर्ड (CBFC) को भी नोटिस जारी किया है। अदालत ने कहा कि कुछ राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों ने अब तक इस पर अपना जवाब दाखिल नहीं किया है, इसलिए सुनवाई की अगली तारीख 2 दिसंबर 2025 तय की गई है।
अदालत ने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षा मंत्रालय को स्कूल पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा (Moral Education) और महिलाओं-बच्चों के अधिकारों से संबंधित अध्यायों को शामिल करने पर विचार करना चाहिए, ताकि बच्चों में छोटी उम्र से ही लैंगिक समानता और कानूनी जागरूकता का विकास हो सके।
याचिका में सुझाए गए उपाय
याचिका में कहा गया है कि देश में लड़कों की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता है और यह प्रक्रिया स्कूल स्तर से ही शुरू होनी चाहिए। इसमें यह भी प्रस्तावित किया गया है कि, शिक्षा मंत्रालय स्कूलों को निर्देश दे कि 14 वर्ष तक के बच्चों की पाठ्यपुस्तकों में यौन अपराधों और उनके दंडात्मक कानूनों से जुड़ी मूल जानकारी दी जाए।
सूचना और प्रसारण मंत्रालय तथा CBFC जैसे संस्थान ऐसे जनजागरूकता अभियानों को बढ़ावा दें जो जनता को बताएं कि POCSO और बलात्कार कानूनों का उद्देश्य संरक्षण है, दंड देना नहीं। मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स को इस विषय पर एथिकल रिपोर्टिंग और सोशल एजुकेशन को बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए।
POCSO अधिनियम को 2012 में लागू किया गया था ताकि बच्चों को यौन अपराधों से कानूनी सुरक्षा मिल सके। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भारत सहित दुनिया के कई देशों में यह बहस चल रही है कि कड़े यौन अपराध कानूनों का दुरुपयोग कैसे रोका जाए।










