करीब 41 साल पुराने स्मगलिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने तीन आरोपियों को दोषी ठहराया है, लेकिन उनकी उम्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया को देखते हुए उन्हें फिर से जेल भेजने से इनकार कर दिया। यह केस 1985 का है और इसमें 777 विदेशी घड़ियों की अवैध तस्करी का मामला सामने आया था।
नई दिल्ली: Supreme Court of India ने करीब 41 साल पुराने स्मगलिंग मामले में तीन आरोपियों को दोषी ठहराया है, लेकिन उनकी उम्र और लंबी कानूनी प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए दोबारा जेल भेजने से इनकार कर दिया। यह मामला 777 विदेशी घड़ियों की अवैध तस्करी से जुड़ा था और मूल रूप से 1985 का है। उस समय देश में विदेशी इलेक्ट्रॉनिक सामान, खासकर खाड़ी देशों से लाए जाने वाले प्रोडक्ट्स की तस्करी आम बात थी।
जब्त की गई घड़ियों में प्रमुख ब्रांड जैसे Seiko, Citizen और Ricoh शामिल थे। इस केस की सुनवाई कई स्तरों पर हुई: भुज ट्रायल कोर्ट ने 18 साल तक सुनवाई की, एक एडिशनल सेशन कोर्ट ने दो साल, गुजरात हाई कोर्ट ने पांच साल और अंततः सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई की, जो लगभग 15 साल तक चली।
मामला क्या था?
1985 में गुजरात में एक विदेशी घड़ी तस्करी का मामला सामने आया। इसमें Seiko, Citizen और Ricoh जैसी ब्रांडेड घड़ियों को अवैध रूप से लाया गया था। उस समय खाड़ी देशों से इलेक्ट्रॉनिक सामान और घड़ियों की तस्करी आम बात थी। भुज ट्रायल कोर्ट ने इस केस की सुनवाई 18 साल तक की, इसके बाद एडिशनल सेशन कोर्ट ने दो साल, गुजरात हाई कोर्ट ने 5 साल, और सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल तक सुनवाई की। कुल मिलाकर इस केस की कानूनी प्रक्रिया लगभग 41 साल चली।
आरोपियों को क्यों जेल नहीं भेजा गया?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में सभी हालात और परिस्थितियों को देखा गया है।
- घटना करीब चार दशक पुरानी है।
- आरोपियों ने पहले ही जेल में सजा काटी है।
- केस लंबे समय से पेंडिंग रहा।
- बचे हुए आरोपियों की उम्र ज्यादा है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्थिति में उन्हें फिर से जेल भेजना अत्यधिक सख्त होगा और न्याय के दृष्टिकोण से उचित नहीं माना गया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट द्वारा तीन साल की जेल की सजा को घटाकर पहले ही काटी गई सजा के अनुसार करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा, “मौजूदा मामले के खास तथ्यों और हालात को देखते हुए, अपील करने वालों की सजा उतनी ही रखी जाए जितनी उन्होंने पहले काटी है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, पूरे मामले पर विचार करने के बाद, हम हाई कोर्ट के निर्णय से सहमत हैं। ट्रायल कोर्ट द्वारा दर्ज किए गए दोष, जिन्हें अपील कोर्ट और हाई कोर्ट ने कन्फर्म किया है, में कोई गैर-कानूनी या साफ गलती नहीं है। इसलिए इस कोर्ट को संविधान के आर्टिकल 136 के तहत दखल देने की आवश्यकता नहीं है।
इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने 41 साल पुराने विवाद का अंत कर दिया, लेकिन साथ ही मानवीय दृष्टिकोण और उम्र को देखते हुए जेल से राहत भी दी।इस केस की लंबी कानूनी प्रक्रिया दर्शाती है कि भारतीय न्याय प्रणाली में न्याय पाने में कई दशक लग सकते हैं। 2003 में ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराया।
7 साल बाद, गुजरात हाई कोर्ट ने उनकी अपील खारिज कर दी और तीन साल की जेल की सजा बरकरार रखी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में 2011 में सुनवाई शुरू हुई और 2026 तक मामला पूरा हुआ। इस पूरी प्रक्रिया में कुल 41 साल लग गए, जो इस केस को भारतीय न्यायिक इतिहास में लंबी सुनवाई वाले मामलों में शामिल करता है।











