दुनिया में ज्यादातर झगड़े और गलतफहमियां इसलिए होती हैं क्योंकि लोग अपनी सीमित जानकारी को ही 'पूरा सच' मान बैठते हैं। यह प्राचीन कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले पूरी तस्वीर देखना कितना जरूरी है, क्योंकि अधूरा सच अक्सर झूठ से भी ज्यादा खतरनाक होता है।
कहानी
एक गाँव में पाँच अंधे दोस्त रहते थे। वे जन्म से ही देख नहीं सकते थे, इसलिए वे दुनिया को छूकर, सुनकर या सूंघकर ही समझते थे। उन्होंने लोगों से 'हाथी' नाम के विशाल जानवर के बारे में बहुत सुन रखा था, लेकिन उन्हें कभी पता नहीं चला कि हाथी असल में कैसा होता है।
एक दिन, गाँव में एक महावत अपना हाथी लेकर आया। यह खबर सुनकर पांचों अंधे दोस्तों में उत्साह जाग उठा। उन्होंने तय किया कि वे आज जाकर खुद महसूस करेंगे कि हाथी कैसा होता है। वे एक-दूसरे का हाथ पकड़कर उस जगह पहुंचे जहाँ हाथी खड़ा था।
पांचों दोस्त हाथी के अलग-अलग हिस्सों के पास खड़े होकर उसे छूने लगे। जो अंधा हाथी के पैर के पास था, उसने मोटा और मजबूत पैर पकड़कर कहा कि हाथी एक बड़े खंभे जैसा होता है। पूंछ के पास खड़े दूसरे अंधे ने पूंछ को पकड़कर उसे रस्सी जैसा बताया।
सूंड के पास खड़े तीसरे अंधे ने हिलती-डुलती सूंड को छूकर कहा कि हाथी एक विशाल और खतरनाक साँप जैसा है। चौथे अंधे ने हाथी के बड़े कान को महसूस कर उसे हवा करने वाले पंखे या सूप जैसा बताया, जबकि पाँचवें अंधे ने हाथी के विशाल पेट पर हाथ फेरते हुए कहा कि हाथी तो एक सपाट और मजबूत दीवार जैसा होता है।
अब पाँचों दोस्तों में बहस शुरू हो गई। हर कोई अपनी बात को ही सच मान रहा था क्योंकि उसने खुद उसे 'महसूस' किया था। 'मैं सही हूँ, तुम गलत हो!' 'नहीं, जो मैंने छुआ वही सच है!'
बहस इतनी बढ़ गई कि वे आपस में लड़ने-झगड़ने लगे। उनकी दोस्ती टूटने की कगार पर आ गई।
तभी वहाँ से एक समझदार व्यक्ति गुजर रहा था, जिसकी आँखों में रोशनी थी। उसने जब इन अंधों को लड़ते देखा, तो वह रुका और उसने पूछा, 'भाई, तुम लोग आपस में क्यों लड़ रहे हो?'
अंधों ने अपनी-अपनी बात बताई। किसी ने हाथी को खंभा, किसी ने रस्सी, तो किसी ने दीवार बताया।
उस समझदार व्यक्ति ने हंसते हुए कहा, 'शांत हो जाओ। तुम पाँचों में से कोई भी झूठ नहीं बोल रहा है। तुम सब अपनी-अपनी जगह सही हो।'
अंधे हैरान रह गए। उन्होंने पूछा, 'ऐसा कैसे हो सकता है? हम सब अलग-अलग बातें कह रहे हैं, तो सब सही कैसे हो सकते हैं?'
उस व्यक्ति ने समझाया, 'तुम सब इसलिए सही हो क्योंकि तुम लोगों ने हाथी के सिर्फ एक-एक हिस्से को छुआ है। जिसने पैर छुआ, उसे वह खंभे जैसा लगा। जिसने पूंछ छुई, उसे रस्सी जैसा लगा। लेकिन, 'पूरा हाथी' तुम सबकी बातों को मिलाकर बनता है। हाथी खंभे जैसा भी है, रस्सी जैसा भी है, पंखे जैसा भी है और दीवार जैसा भी।'
अंधों को अपनी गलती का अहसास हुआ। वे समझ गए कि वे एक छोटे से हिस्से को ही पूरा सच मान बैठे थे। उन्होंने अपना झगड़ा बंद किया और उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया।
सीख
हम अक्सर अपने थोड़े से अनुभव या ज्ञान को ही संपूर्ण सत्य मान लेते हैं और दूसरों के नजरिए को समझने की कोशिश नहीं करते। यही अज्ञानता अहंकार और झगड़ों का कारण बनती है। हमें यह समझना चाहिए कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं और सच्चाई के कई रूप हो सकते हैं। किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें पूरी स्थिति को समझने की कोशिश करनी चाहिए।








