अयोध्या के नव्य-भव्य श्रीराम मंदिर में विराजमान रामलला न केवल करोड़ों भक्तों की आस्था का केंद्र हैं, बल्कि उनका प्रतिदिन का शृंगार और राजसी ठाठ भी पूरे देश का ध्यान आकर्षित कर रहा है। रामलला के वस्त्र और श्रृंगार का चयन दिन, ऋतु और पारंपरिक महत्व के अनुसार किया जाता है।
Ram Mandir: अयोध्या के भव्य श्रीराम मंदिर में विराजित रामलला का ठाठ-बाट बेहद राजसी और आकर्षक है। उनके रागभोग में विशेष और लजीज व्यंजनों का समावेश रहता है, जो उनकी महिमा और भव्यता को और बढ़ाता है। रामलला नित्य नए और अलग-अलग रंगों के वस्त्र धारण करते हैं, जो मुख्यतः सिल्क के बने होते हैं। ये वस्त्र राजस्थान, बंगाल, कश्मीर, उड़ीसा और आंध्र जैसे राज्यों के पारंपरिक सिल्क से तैयार किए जाते हैं।
रामलला के दैनिक वस्त्रों का रंगों का क्रम भी निश्चित है—सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को क्रीम, शनिवार को नीला और रविवार को गुलाबी रंग। वे नित्य नई धोती और दो पटके पहनते हैं, जिनमें एक छोटा और दूसरा बड़ा होता है। इन पटकों पर गुलाबी रंग की विशेष डाइंग या छपाई की जाती है। यह सभी परिधान पूर्णतया भारतीय और परंपरागत हैं, जो रामलला के दिव्य और शाही रूप को दर्शाते हैं।
हर दिन के लिए अलग रंग—समृद्ध परंपरा का प्रतीक
रामलला के दैनिक श्रृंगार में रंगों की विशेष भूमिका है। सप्ताह के सातों दिन विशेष रंग के वस्त्र पहनाए जाते हैं, जो आध्यात्मिक अर्थों से जुड़े हैं:
- सोमवार – सफेद (पवित्रता और शांति का प्रतीक)
- मंगलवार – लाल (ऊर्जा और शक्ति का प्रतिनिधित्व)
- बुधवार – हरा (संतुलन और समृद्धि का रंग)
- गुरुवार – पीला (ज्ञान और आध्यात्मिकता का प्रतीक)
- शुक्रवार – क्रीम (सौम्यता और सादगी का भाव)
- शनिवार – नीला (धैर्य और संरक्षण का भाव)
- रविवार – गुलाबी (प्रेम और सौहार्द का रंग)
हर दिन रामलला को नई धोती और दो पटका पहनाए जाते हैं। इन पारंपरिक परिधानों पर हल्की गुलाबी डाइंग की छाप रहती है, जो उनकी शृंगार शैली को और अधिक आकर्षक बनाती है।

भारत के विविध प्रदेशों के सिल्क से तैयार होते हैं रामलला के परिधान
रामलला के वस्त्र देशभर के प्रसिद्ध सिल्क परंपराओं से तैयार किए जाते हैं। ये पूर्णतः भारतीय, हस्तनिर्मित और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध होते हैं। अब तक उपयोग किए गए प्रमुख सिल्क:
- असम का हरा सिल्क
- उड़ीसा की संबलपुरी
- बंगाल की जामदानी
- राजस्थान की बंधेज-बांधनी
- आंध्र प्रदेश की इक्कत सिल्क
सभी वस्त्र विशेष रूप से धर्मावरम (आंध्र प्रदेश) के हाथकरघा केंद्रों पर बुने जाते हैं। डिजाइनिंग का अंतिम रूप दिल्ली में विशेषज्ञ टीम द्वारा तैयार किया जाता है।
सर्दियों में कश्मीर की पश्मीना और लद्दाख की ऊन से विशेष शृंगार
मौसम बदलने के साथ रामलला के वस्त्र भी बदलते हैं। डिज़ाइनर मनीष त्रिपाठी, जो रामलला के परिधानों की डिजाइनिंग की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, बताते हैं कि भगवान के वस्त्र मौसम के अनुकूल बनाए जाते हैं।
- गर्मी और सावन: हल्का कॉटन-सिल्क
- सर्दी: ऊनी सिल्क
- कड़ाके की ठंड: कश्मीर, लद्दाख और हिमाचल की पश्मीना सिल्क से बने विशेष वस्त्र
पश्मीना शॉल की गर्माहट और मुलायम स्पर्श रामलला के शीतकालीन शृंगार को अद्वितीय बनाता है। इन ऊनी कपड़ों को इस तरह से बुना जाता है कि वे आकर्षक होने के साथ-साथ भगवान के विग्रह के लिए आरामदायक भी हों। हर परिधान पर उस क्षेत्र की पारंपरिक कला जैसे बांधनी, जामदानी, इक्कत, संबलपुरी आदि की झलक दिखाई देती है। यह केवल वस्त्र नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का एक जीवंत प्रतीक है।










