BMC चुनाव से पहले एनसीपी में सियासी हलचल तेज हो गई है। शरद पवार और अजीत पवार की संभावित सुलह को लेकर चर्चाएं बढ़ीं हैं, जिससे मुंबई की राजनीति और गठबंधन समीकरणों पर बड़ा असर पड़ सकता है आगे चलकर।
Mumbai: महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। क्या बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन यानी BMC Elections से पहले शरद पवार और अजीत पवार के बीच सुलह होगी। बीते कुछ दिनों में जिस तरह के राजनीतिक संकेत सामने आए हैं, उससे यह अटकलें तेज हो गई हैं कि एनसीपी के दोनों गुट किसी बड़े फैसले की ओर बढ़ रहे हैं। यह केवल पारिवारिक मामला नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मुंबई की सत्ता और राज्य की राजनीति पर पड़ सकता है।
चाचा-भतीजे की बातचीत ने बढ़ाई चर्चा
शुक्रवार दोपहर पुणे नगर निगम चुनाव को लेकर शरद पवार और अजीत पवार के बीच सीट-शेयरिंग पर बातचीत तय मानी जा रही थी। इस चर्चा में BMC चुनाव का मुद्दा भी शामिल बताया गया। जुलाई 2023 में अजीत पवार ने शरद पवार का साथ छोड़कर भाजपा के साथ गठबंधन किया था और उपमुख्यमंत्री बने थे। अब वही अजीत पवार इस गठबंधन में खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं, ऐसा राजनीतिक हलकों में कहा जा रहा है।
भाजपा गठबंधन में असहजता
अजीत पवार की बेचैनी की सबसे बड़ी वजह भाजपा के साथ तालमेल को लेकर बताई जा रही है। सूत्रों के मुताबिक, मुंबई चुनाव campaign के लिए अजीत पवार गुट ने नवाब मलिक को चेहरा बनाने का प्रस्ताव रखा था। भाजपा ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया। पार्टी ने नवाब मलिक के कथित अंडरवर्ल्ड लिंक का हवाला देते हुए साफ कर दिया कि वह इस नाम को स्वीकार नहीं करेगी।
वोट बैंक की राजनीति का गणित
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नवाब मलिक को लेकर असहमति सिर्फ सतही कारण है। असली चिंता वोट बैंक को लेकर है। एनसीपी का एक बड़ा आधार मुस्लिम और दलित वोटरों में रहा है। भाजपा को डर है कि अगर यह समीकरण ज्यादा मजबूत हुआ, तो उसका core Hindu vote bank प्रभावित हो सकता है। यही वजह है कि गठबंधन के भीतर तनाव बढ़ता दिख रहा है।

ठाकरे भाइयों की सुलह से बदला माहौल
महाराष्ट्र की राजनीति में हाल ही में उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की सुलह ने नया संदेश दिया है। करीब 20 साल बाद मराठी भाषा और अस्मिता के मुद्दे पर दोनों एक मंच पर आए और साथ चलने का संकेत दिया। इस घटनाक्रम के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या पवार परिवार भी इसी राह पर आगे बढ़ेगा। शरद पवार की चुप्पी और अजीत पवार की बेचैनी ने इस चर्चा को और हवा दे दी है।
महा विकास अघाड़ी की स्थिति
उद्धव ठाकरे की शिवसेना अब भी कांग्रेस और शरद पवार गुट की एनसीपी के साथ महा विकास अघाड़ी यानी MVA का हिस्सा बनी हुई है। हालांकि राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के साथ गठबंधन को लेकर अभी भी असमंजस है। किसी भी दल ने खुलकर यह नहीं कहा है कि वे राज ठाकरे के साथ चुनावी तालमेल करेंगे। ऐसे में पवार परिवार की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला
इस पूरे समीकरण को और जटिल बना दिया है कांग्रेस के फैसले ने। कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि वह BMC चुनाव अकेले लड़ेगी। इस फैसले से शरद पवार गुट की एनसीपी को MVA में सीट-शेयरिंग को लेकर ज्यादा जगह नहीं मिल पाई। यही वजह है कि अब दोनों बड़े गठबंधन की नजरें एनसीपी पर टिकी हुई हैं।
अजीत पवार की असली परीक्षा
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अजीत पवार आगे क्या करेंगे। क्या वह शरद पवार के साथ फिर से एक होंगे या पूरी तरह अलग रास्ता चुनेंगे। चर्चा है कि BMC चुनाव में अगर उनकी पार्टी को झटका भी लगता है, तो इसे अंतिम हार नहीं माना जाएगा। असली मकसद यह देखना है कि अकेले दम पर अजीत पवार की एनसीपी कितनी मजबूत है।
हालिया चुनावी प्रदर्शन का असर
2024 के विधानसभा चुनाव में अजीत पवार गुट की एनसीपी ने 59 में से 41 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया था। यह प्रदर्शन उस समय आया, जब लोकसभा चुनाव में पार्टी का हाल बेहद खराब रहा था और चार में से सिर्फ एक सीट ही मिल पाई थी। विधानसभा में मजबूत नतीजे ने अजीत पवार के आत्मविश्वास को बढ़ाया है।











