मुंबई BMC चुनाव 2026 में अरुण गवली की दोनों बेटियों, गीता और योगिता, हार गई हैं। बीजेपी और महायुति गठबंधन की मजबूत जीत ने गवली परिवार की राजनीतिक पकड़ कमजोर कर दी। जनता ने पारिवारिक विरासत से ज्यादा व्यक्तिगत क्षमताओं पर भरोसा जताया।
BMC Election: मुंबई की राजनीति में गैंगस्टर से नेता बने अरुण गवली के परिवार को बीएमसी चुनाव 2026 में बड़ा झटका लगा है। उनके राजनीतिक करियर की विरासत को उनके ही परिवार ने संभालने की कोशिश की थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं रहा। अरुण गवली की दोनों बेटियां, गीता गवली और योगिता गवली, नगर निगम के चुनाव हार गई हैं। यह हार गवली परिवार के घटते राजनीतिक प्रभाव का साफ संकेत है।
गीता गवली को बायकुला के वार्ड 212 में समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार अमरीन शहजान ने हराया। वहीं योगिता गवली को वार्ड 207 में बीजेपी के रोहिदास लोखंडे ने मात दी। दोनों बेटियों की हार को राजनीतिक विश्लेषक गवली परिवार के लिए डबल झटका बता रहे हैं। एक समय बायकुला इलाके में गवली परिवार का खासा प्रभाव रहा है।
डॉन नहीं, डैडी की बेटियां
चुनाव से पहले गवली बहनों ने यह स्पष्ट किया था कि वे लोग उन्हें 'डॉन की बेटियां' के रूप में नहीं, बल्कि 'डैडी की बेटियां' के रूप में देखें। उन्होंने कहा कि बायकुला की गदड़ी चॉल में लोग अरुण गवली को आज भी उम्मीद और भरोसे के साथ देखते हैं। समर्थक अरुण गवली को प्यार से 'डैडी' कहकर बुलाते हैं और मानते हैं कि उन्होंने कई सामाजिक और स्थानीय समस्याओं का समाधान किया है।
गीता और योगिता ने चुनावी प्रचार में यह संदेश देने की कोशिश की थी कि वे अपने पिता की सामाजिक छवि और जनप्रियता को आगे बढ़ाएंगी। लेकिन जनता ने उन्हें मुख्यतः व्यक्तिगत राजनीतिक क्षमताओं के आधार पर आंका और दोनों बेटियों को हार का सामना करना पड़ा।
अरुण गवली का अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक सफर

अरुण गवली 1970 के दशक में मुंबई के अंडरवर्ल्ड में उभरे। वह और उनके भाई किशोर 'बायकुलाकंपनी' गिरोह का हिस्सा थे, जो बायकुला, परेल और साट रास्ता इलाके में सक्रिय था। 1988 में गवली ने गिरोह की कमान संभाली और 80-90 के दशक में दाऊद इब्राहिम के गिरोह के साथ उनकी जबरदस्त दुश्मनी रही।
1980 के दशक में उन्हें शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे का राजनीतिक संरक्षण मिला। हालांकि 1990 के दशक के मध्य में उनके और शिवसेना के बीच मतभेद पैदा हो गए। इसके बाद उन्होंने अपनी पार्टी बनाई और 2004 से 2009 तक चिंचपोकली से विधायक रहे। 2008 में एक शिवसेना पार्षद की हत्या के मामले में उन्हें जेल जाना पड़ा। करीब 17 साल जेल में रहने के बाद उन्हें पिछले साल सितंबर में जमानत मिली।
गवली परिवार की राजनीतिक विरासत
अरुण गवली के राजनीतिक सफर और अंडरवर्ल्ड से जुड़े अनुभवों ने उनके परिवार को मुंबई के स्थानीय राजनीति में मजबूत स्थिति दिलाई। उनके समर्थक आज भी उन्हें डैडी के रूप में मानते हैं और गवली परिवार की जनप्रियता पर विश्वास रखते हैं।
लेकिन बीएमसी चुनाव में गवली बेटियों की हार ने यह साफ कर दिया कि अब जनता केवल पारिवारिक विरासत के आधार पर समर्थन नहीं देती। जनता ने व्यक्तिगत कार्य, प्रदर्शन और पार्टी की वर्तमान नीतियों के आधार पर वोट किया।
चुनाव के नतीजे और उनका असर
बीएमसी चुनाव में गवली परिवार की दोनों बेटियों की हार ने बीजेपी और अन्य बड़े राजनीतिक दलों के लिए अवसर पैदा किया। गीता और योगिता के हारने से यह भी स्पष्ट हो गया कि स्थानीय राजनीति में पारिवारिक प्रभाव का दौर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है।
विश्लेषक मानते हैं कि गवली परिवार की राजनीतिक पकड़ अब सीमित होती जा रही है। बायकुला और आसपास के इलाकों में उनका एक समय का प्रभाव अब केवल स्मृति और ऐतिहासिक पहचान तक रह गया है।











