दिल्ली: पांडवों का इंद्रप्रस्थ और मुगलों का पहला शहर, जानिए आज की राष्ट्रीय राजधानी की कहानी

दिल्ली: पांडवों का इंद्रप्रस्थ और मुगलों का पहला शहर, जानिए आज की राष्ट्रीय राजधानी की कहानी

हाल ही में केरल के नाम बदलने के बाद अब दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने की मांग उठी है। भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्र सरकार से आग्रह किया कि राष्ट्रीय राजधानी का नाम प्राचीन इतिहास और महाभारत काल के अनुरूप बदलकर इंद्रप्रस्थ किया जाए।

नई दिल्ली: दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा सांसद Praveen Khandelwal ने केंद्र सरकार से राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ करने पर विचार करने का आग्रह किया है। उन्होंने कहा कि पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया द्वारा पुराने किले में की गई खुदाई में लगभग 1000 ईसा पूर्व की प्राचीन बसावट के प्रमाण मिले हैं। इनमें पेंटेड ग्रे वेयर संस्कृति के अवशेष भी शामिल हैं, जिन्हें महाभारत काल से जोड़ा जाता है। इन खोजों से यह धारणा मजबूत होती है कि प्राचीन इंद्रप्रस्थ वही स्थान था जहाँ आज दिल्ली स्थित है।

खंडेलवाल ने आगे कहा कि 'दिल्ली' नाम अपेक्षाकृत बाद के मध्यकालीन दौर में प्रचलित हुआ, जिसे इतिहासकार ढिल्लिका या देहली जैसे नामों से जोड़ते हैं। उनका मानना है कि यह नाम दिल्ली की मूल और प्राचीन सभ्यतागत पहचान का सही प्रतिनिधित्व नहीं करता।

प्राचीन इतिहास: पांडवों का इंद्रप्रस्थ

यमुना तट पर बसे दिल्ली का इतिहास अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण रहा है। कहा जाता है कि महाभारत के समय पांडवों ने खांडवप्रस्थ नामक बंजर भूमि को भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन में एक भव्य नगर में परिवर्तित किया। देवशिल्पी विश्वकर्मा और मयासुर ने मिलकर इसे एक दिव्य और आधुनिक नगर का रूप दिया, जिसे पांडवों ने इंद्रप्रस्थ नाम दिया।

महाभारत में वर्णित ‘मयासभा’ का निर्माण भी इसी नगर में हुआ था। हालांकि इतिहास में यह स्पष्ट नहीं है कि इंद्रप्रस्थ कब और कैसे उजड़ा। फिर भी यह स्थान भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं में महत्वपूर्ण रहा।

मध्यकालीन दिल्ली: खिलजी और तुगलक वंश

इतिहास में दर्ज है कि 13वीं सदी के अंतिम दशक में दिल्ली पर खिलजी वंश का शासन रहा। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में मंगोलों के बार-बार हमले होते रहे। सुरक्षा के कारण उन्होंने कुतुब मीनार के पास एक गोलाकार किले का निर्माण कराया और इसे अपनी राजधानी बनाया, जिसे सिरी कहा गया। यह मुगलों का दिल्ली में पहला बसाया गया शहर माना जाता है।

इसके बाद तुगलक वंश ने शासन किया। गयासुद्दीन तुगलक ने सिरी से हटकर तुगलकाबाद में नई राजधानी बसाई। लेकिन पानी की कमी के कारण राजधानी को फिर से सिरी में ले जाया गया। मोहम्मद बिन तुगलक ने थोड़े समय के लिए राजधानी को दौलताबाद स्थानांतरित किया, और फिरोज शाह तुगलक ने दिल्ली में स्थायी राजधानी बसाई, जिसे आज फिरोज शाह कोटला के नाम से जाना जाता है।

मुगलों का दिल्ली पर कब्जा

14वीं से 16वीं शताब्दी में दिल्ली पर तैमूर लंग, सैय्यद वंश और लोदी वंश का शासन रहा। मुगलों के आने के बाद बाबर ने आगरा को अपनी राजधानी बनाया, जबकि उनके उत्तराधिकारी हुमायूं ने यमुना किनारे दीनपानाह शहर बसाया। शेरशाह सूरी ने हुमायूं का शहर अपने नाम से पुनः नामित किया और यहां पुराना किला बनवाया।

इसके बाद मुगल बादशाह शाहजहां ने यमुना किनारे अपनी नई राजधानी बसाई और इसे शाहजहानाबाद नाम दिया। इसी क्षेत्र को आज पुरानी दिल्ली कहा जाता है। शाहजहां ने कई ऐतिहासिक गेट बनवाए – कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट, तुर्कमान गेट और अजमेरी गेट – जो आज भी दिल्ली की सभ्यता और इतिहास की पहचान हैं।

दिल्ली और विदेशी आक्रमण

दिल्ली का इतिहास केवल राजाओं और शासकों तक सीमित नहीं है। यह शहर विदेशी आक्रमणों और सत्ता संघर्षों का भी साक्षी रहा। नादिर शाह, मराठा और अन्य आक्रमणकारियों ने दिल्ली पर हमले किए। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के आने के बाद कलकत्ता से दिल्ली को राजधानी बनाया गया और नई दिल्ली का निर्माण शुरू हुआ।

नई दिल्ली का डिजाइन ब्रिटिश वास्तुकार सर एडविन लुटियन्स ने तैयार किया। भारत की आजादी के बाद, दिल्ली एक आधुनिक महानगर के रूप में विकसित हुई और आज यह राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है। इंडिया गेट, राष्ट्रपति भवन और विभिन्न मंत्रालय इसके प्रमुख प्रतीक हैं।

दिल्ली: एक इतिहास का मिश्रण

दिल्ली सिर्फ पांडवों का इंद्रप्रस्थ या मुगलों का शहर नहीं है। यह शहर राजाओं, आक्रमणकारियों और लोकतांत्रिक शासन का मिश्रण है। हर शासक ने अपनी सभ्यता और संस्कृति दिल्ली की जमीन में छोड़ी। यही कारण है कि दिल्ली आज चौबीसों घंटे जीवंत, भागती-भागती और विविध संस्कृतियों का संगम बन चुकी है।

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