मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया 27 पैसे गिरकर 91.25 पर पहुंच गया। निवेशकों की सुरक्षित निवेश की ओर बढ़ती मांग से डॉलर मजबूत हुआ और भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ा।
Dollar vs Rupee: सोमवार 2 मार्च को भारतीय मुद्रा में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। बाजार खुलते ही रुपया 27 पैसे टूटकर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.25 के स्तर पर पहुंच गया। यह बीते एक महीने का सबसे निचला स्तर है।
वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल ने रुपये पर दबाव बढ़ा दिया है। निवेशकों के बीच अनिश्चितता बढ़ने से सुरक्षित निवेश की मांग बढ़ी है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव आया।
डॉलर की मजबूती
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई है। जब भी तेल महंगा होता है तो भारत जैसे बड़े आयातक देश पर सीधा असर पड़ता है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है।
डॉलर इंडेक्स में मजबूती भी रुपये के लिए नकारात्मक संकेत है। जब निवेशक जोखिम से बचने के लिए डॉलर खरीदते हैं, तो अन्य मुद्राएं दबाव में आ जाती हैं। यही वजह है कि सोमवार को रुपये में तेज गिरावट देखने को मिली।
ईरान पर हवाई हमले से बढ़ी चिंता
शनिवार और रविवार को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हवाई हमले किए। रिपोर्टों के अनुसार इन हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर आयतोल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई। इसके जवाब में ईरान ने क्षेत्र में कई स्थानों पर मिसाइल हमले किए।
इस घटनाक्रम के बाद क्षेत्रीय संकट के लंबा खिंचने की आशंका बढ़ गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने एक मीडिया इंटरव्यू में कहा कि यह संघर्ष अगले चार हफ्तों तक चल सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब तक अमेरिका अपने लक्ष्य हासिल नहीं कर लेता, तब तक कार्रवाई जारी रहेगी।
इन बयानों से वैश्विक बाजारों में अस्थिरता और बढ़ गई है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य बना चिंता का केंद्र
तनाव बढ़ने के बाद ईरान ने हॉर्मुज जलडमरूमध्य से आवाजाही बंद करने की घोषणा की है। यह समुद्री मार्ग दुनिया की लगभग पांचवां हिस्सा तेल आपूर्ति के लिए अहम है।
अगर इस रास्ते से सप्लाई प्रभावित होती है तो वैश्विक तेल बाजार में भारी उथल-पुथल हो सकती है। सप्लाई बाधित होने की आशंका से ही कच्चे तेल की कीमतें एक साल से अधिक के उच्च स्तर पर पहुंच गई हैं।
तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल बढ़ सकता है। इससे चालू खाता घाटा बढ़ने और रुपये पर अतिरिक्त दबाव आने की संभावना रहती है।
निवेशकों का सुरक्षित एसेट की ओर रुख
भू-राजनीतिक अनिश्चितता के समय निवेशक जोखिम वाले एसेट से दूरी बनाते हैं। शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बढ़ने के साथ निवेशक सोना और डॉलर जैसे सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख करते हैं।
डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय रुपये समेत कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं कमजोर हुई हैं। विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकासी भी रुपये पर दबाव का एक कारण हो सकती है।
रुपया पहले भी छू चुका है रिकॉर्ड निचला स्तर
इस साल की शुरुआत में रुपया डॉलर के मुकाबले 91.9875 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। मौजूदा गिरावट ने फिर से चिंता बढ़ा दी है।
एक साल पहले की तुलना में रुपया लगभग 4 प्रतिशत कमजोर हो चुका है। यह गिरावट धीरे-धीरे बढ़ते वैश्विक दबाव और घरेलू आर्थिक कारकों का संयुक्त परिणाम है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
रुपये की कमजोरी का असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है। आयात महंगा हो जाता है, जिससे कंपनियों की लागत बढ़ सकती है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर भी दबाव आ सकता है।
हालांकि निर्यातकों के लिए कमजोर रुपया कुछ हद तक फायदेमंद हो सकता है, क्योंकि उन्हें डॉलर में ज्यादा मूल्य मिलता है। लेकिन अगर गिरावट बहुत तेज होती है तो समग्र आर्थिक स्थिरता पर असर पड़ सकता है।












