मुजफ्फरपुर शहर के एक श्मशान घाट का दृश्य आम तौर पर सन्नाटा, धुआं और अंतिम विदाई की पीड़ा से जुड़ा होता है। लेकिन इसी मसान की जमीन पर कुछ बच्चे अपने भविष्य के सपने गढ़ रहे हैं। यहां जलती चिताओं के पास बैठकर पढ़ाई होती है, कॉपी-किताबें खुलती हैं और ककहरा से लेकर गणित के सवाल तक हल किए जाते हैं। यह कहानी है अप्पन पाठशाला की, जो बिहार के मुजफ्फरपुर में श्मशान घाट के बीच चल रही एक अनोखी पहल है।
श्मशान में जहां एक ओर अंतिम संस्कार की रस्में चलती रहती हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ बच्चे जमीन पर दरी बिछाकर पढ़ाई में जुटे दिखाई देते हैं। उनके आसपास लकड़ियों का ढेर, राख के ढेर और कभी-कभी उठता धुआं भी होता है, लेकिन इन सबके बीच उनका ध्यान किताबों पर टिका रहता है। जिन बच्चों के परिवार आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिनके पास पढ़ाई के लिए अलग से संसाधन या सुरक्षित माहौल नहीं है, उनके लिए यह पाठशाला उम्मीद की किरण बनी है।
स्थानीय लोगों की मदद से शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य उन बच्चों को शिक्षा से जोड़ना है, जो मजदूर परिवारों से आते हैं या जिनके माता-पिता श्मशान घाट पर काम करते हैं। कई बच्चे ऐसे हैं, जिनका बचपन इन्हीं गलियों और इसी वातावरण में बीता है। पहले उनका समय यूं ही इधर-उधर खेलते या काम में हाथ बंटाते गुजर जाता था, लेकिन अब वे रोज तय समय पर यहां पहुंचते हैं और पढ़ाई करते हैं।
सबसे खास बात यह है कि होली के मौके पर यहां ‘भस्म की होली’ खेली जाती है। जब शहर के अन्य हिस्सों में रंग और गुलाल उड़ते हैं, तब इस श्मशान में बच्चे राख से एक-दूसरे को टीका लगाते हैं। यह परंपरा यहां के वातावरण से जुड़ी है और बच्चों के लिए एक प्रतीक है—जीवन और मृत्यु के बीच भी उम्मीद और उल्लास की जगह बनी रहती है। हालांकि इस दौरान पूरी सावधानी बरती जाती है और बच्चों को सुरक्षित तरीके से ही शामिल किया जाता है।
पाठशाला के संचालक बताते हैं कि शुरुआत में लोगों को यह विचार अजीब लगा था कि श्मशान में स्कूल कैसे चल सकता है। लेकिन धीरे-धीरे समाज ने इस प्रयास को सराहा। अब कई स्वयंसेवक यहां आकर बच्चों को पढ़ाते हैं। कोई हिंदी सिखाता है, कोई गणित, तो कोई अंग्रेजी की बुनियादी जानकारी देता है। बच्चों को किताबें, कॉपियां और स्टेशनरी भी दान के रूप में मिलती हैं।
यहां पढ़ने वाले बच्चों के सपने भी बड़े हैं। कोई पुलिस अधिकारी बनना चाहता है, कोई शिक्षक, तो कोई डॉक्टर बनने की इच्छा रखता है। उनके सपनों की उड़ान उस धुएं से भी ऊंची है, जो चिताओं से उठता है। गरीबी, संसाधनों की कमी और कठिन वातावरण के बावजूद उनके भीतर आगे बढ़ने की जिद साफ दिखाई देती है।
स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शिक्षा ही वह माध्यम है, जो इन बच्चों की जिंदगी की दिशा बदल सकती है। श्मशान घाट में चल रही यह पाठशाला इस बात का उदाहरण है कि अगर इरादा मजबूत हो तो परिस्थितियां बाधा नहीं बनतीं। यहां हर दिन जीवन का एक नया पाठ पढ़ाया जाता है—सिर्फ किताबों का नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और उम्मीद का भी।
मुजफ्फरपुर की यह अनोखी पहल अब धीरे-धीरे पहचान बना रही है। लोग इसे देखने और समझने के लिए भी आते हैं। ‘अप्पन पाठशाला’ ने यह साबित कर दिया है कि शिक्षा की लौ कहीं भी जलाई जा सकती है, चाहे वह स्थान मसान ही क्यों न हो। जलती चिताओं के बीच बैठकर पढ़ते ये बच्चे यह संदेश देते हैं कि सपनों को साकार करने के लिए माहौल नहीं, हौसला चाहिए










