होली 2026 में होलिका दहन 2 मार्च को और रंगों वाली धुलेंडी 4 मार्च को मनाई जाएगी। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत, सामाजिक मेल-जोल और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। धार्मिक परंपराओं के साथ-साथ प्राकृतिक और सुरक्षित रंगों का प्रयोग करने पर जोर दिया जा रहा है, ताकि उत्सव आनंदमय और सुरक्षित रहे।
Holi 2026: इस साल होलिका दहन 2 मार्च को शाम 5 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 3 मार्च की शाम तक होगा, जबकि धुलेंडी यानी रंग खेलने वाली होली 4 मार्च को मनाई जाएगी। भारत में यह त्योहार परिवार और मित्रों के साथ मिलकर खेलों और पूजा के माध्यम से बुराई पर अच्छाई की जीत, सामाजिक समरसता और मानसिक ऊर्जा बढ़ाने का संदेश देता है। प्राकृतिक रंगों और सुरक्षित उत्सव के साथ यह परंपरा सभी उम्र के लोगों के लिए आनंद और सकारात्मकता लाती है।
होलिका दहन 2026 बुराई पर अच्छाई की जीत
हिन्दू धर्म में होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। पंचांग के अनुसार फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5 बजकर 56 मिनट से शुरू होकर 3 मार्च की शाम 5 बजकर 8 मिनट तक रहेगी। इस दौरान भद्रा मुख 2 बजकर 38 मिनट से 4 बजकर 34 मिनट तक रहेगा, इसलिए होलिका दहन 2 मार्च को करना शुभ माना गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन लोग होलिका की प्रतिमा या लकड़ी की चिता जलाकर बुराई का नाश और सकारात्मक ऊर्जा के प्रवेश का प्रतीक मानते हैं। इस दिन राधा-कृष्ण, भगवान शिव और माता लक्ष्मी की विधिवत पूजा करना भी शुभ माना जाता है। पूजा में गुलाल, रंग, फूल और मिठाइयां अर्पित की जाती हैं, जिससे घर में सकारात्मकता और सुख-समृद्धि बनी रहती है।

धुलेंडी 2026 रंगों का उत्सव
इस वर्ष रंग खेलने वाली होली यानी धुलेंडी 4 मार्च को मनाई जाएगी। इसका कारण यह है कि इस बार पूर्णिमा तिथि पर दोपहर 3 बजकर 20 मिनट से चंद्र ग्रहण भी हो रहा है, जिससे सूतक काल लागू होगा। इसलिए पंचांग के अनुसार रंगोत्सव 4 मार्च को सुरक्षित और शुभ माना गया है।
धुलेंडी का उत्सव परिवार और मित्रों के बीच मेल-जोल बढ़ाने का अवसर होता है। इस दिन लोग गुलाल, अबीर और रंगों के साथ एक-दूसरे पर रंग डालकर आनंद और खुशियों का आदान-प्रदान करते हैं। खासकर बच्चों और युवाओं के लिए यह दिन हर्षोल्लास का प्रतीक है। रंग खेलते समय लोगों को एक-दूसरे की भावनाओं और सामाजिक मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिए, ताकि उत्सव सुरक्षित और सकारात्मक रहे।
होली का धार्मिक और सामाजिक महत्व
होली केवल रंगों का उत्सव नहीं है, बल्कि इसका धार्मिक और सामाजिक महत्व भी बहुत गहरा है। यह त्योहार हमें बुराई पर अच्छाई की जीत, नकारात्मकता से मुक्ति और सामूहिक भाईचारे का संदेश देता है। होलिका दहन और धुलेंडी की परंपरा इस बात को रेखांकित करती है कि भक्ति, धर्म और सत्य का मार्ग ही जीवन में स्थायी सुख और सफलता का मार्ग है।
इसके अलावा, होली की पूजा-पाठ और रंगोत्सव में सुरक्षा और स्वच्छता का ध्यान रखना भी जरूरी है। पर्व के दौरान बच्चों और बुजुर्गों की सुरक्षा को प्राथमिकता देना चाहिए। पारिवारिक और सामाजिक मेल-जोल बढ़ाने के लिए यह अवसर अनूठा होता है, जिससे समाज में सकारात्मकता और सांस्कृतिक समृद्धि आती है।
त्योहार के दौरान पूजा और परंपराएं
होलिका दहन और धुलेंडी के दिन विशेष पूजा और परंपराओं का पालन करना शुभ माना जाता है। लोग शाम के समय खुले मैदान में चिता जलाते हैं और मंत्रों का उच्चारण करते हैं। साथ ही भजन-कीर्तन और धार्मिक गीतों के माध्यम से त्योहार को आनंदमय बनाते हैं।
धार्मिक दृष्टि से यह पर्व भक्ति और निष्ठा की भावना को मजबूत करता है। बच्चों को इस दिन की कथा सुनाना और रंगों के उत्सव के साथ उनका नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा देना भी परंपरा का हिस्सा है। इससे युवा पीढ़ी में धार्मिक आस्था और सामाजिक चेतना दोनों बढ़ती हैं।
स्वास्थ्य और सुरक्षा का ध्यान
होली के रंगों में हानिकारक रसायन भी हो सकते हैं, इसलिए प्राकृतिक और सेफ कलर्स का उपयोग करना चाहिए। बच्चों और बुजुर्गों के लिए सुरक्षित रंगों और गुलाल का चयन करना जरूरी है। होली खेलते समय आसपास के लोगों की सहमति और शारीरिक सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
इसके अलावा, पर्व के दौरान खाने-पीने की चीजों में साफ-सफाई और स्वच्छता का ध्यान रखा जाना चाहिए। मिठाइयों और पकवानों का सेवन सही तरीके से करना स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। इस तरह, होली का उत्सव आनंदमय और सुरक्षित रहता है।
आधुनिक होली और समाज में बदलाव
आज होली केवल पारंपरिक रूप में नहीं बल्कि डिजिटल और सोशल मीडिया के माध्यम से भी मनाई जाती है। लोग अपने रंगभरे उत्सव और तस्वीरें साझा करते हैं। इसके साथ ही पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते इको-फ्रेंडली रंगों और सुरक्षित रसायनों का प्रयोग बढ़ा है।
सामाजिक दृष्टि से होली समुदाय को जोड़ने, भाईचारे और मित्रता को मजबूत करने का अवसर है। विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और संगीत के माध्यम से युवा और बुजुर्ग दोनों इस उत्सव का आनंद उठाते हैं।









