नई दिल्ली में आयोजित AI इम्पेक्ट समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी से जुड़े विवाद ने यह दिखाया कि भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में कई खामियां मौजूद हैं, जिन्हें अक्सर बड़ी-बड़ी घोषणाओं और चमकदार कार्यक्रमों के पीछे छिपा दिया जाता है।
नई दिल्ली: नई दिल्ली में हाल ही में आयोजित AI इम्पेक्ट समिट में गलगोटिया यूनिवर्सिटी को लेकर जो विवाद सामने आया, उसने भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था में छिपी गंभीर चुनौतियों को उजागर किया। प्राइवेट यूनिवर्सिटी में अक्सर दिखावे और ब्रैंडिंग पर जोर दिया जाता है, जबकि रिसर्च और शिक्षा में गुणवत्ता सरकारी विश्वविद्यालयों से पीछे रह जाती है। अब वक्त आ गया है कि इन संस्थानों को अपने शिक्षक, प्रशासन और अकादमिक स्वतंत्रता पर ध्यान देना होगा, न कि केवल इमारतों और मार्केटिंग पर।
भरोसा नहीं बना पाए प्राइवेट संस्थान
गलगोटिया यूनिवर्सिटी का विवाद महज एक निजी संस्थान की गलती नहीं है। इसे भारत की उच्च शिक्षा में हो रहे बदलावों के संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। पिछले तीन दशक में प्राइवेट यूनिवर्सिटी तेजी से बढ़ी हैं, ताकि छात्रों के लिए अधिक अवसर उपलब्ध हो सकें। हालांकि, नियम और शैक्षणिक ढांचा इस वृद्धि के साथ तालमेल नहीं बैठा पाए। नतीजतन, कई संस्थानों के पास केवल कागज पर मान्यता होती है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
इस समस्या में सिर्फ निजी क्षेत्र की गलती नहीं है। सरकार और नियामक संस्थाएं भी जिम्मेदार हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) और अन्य नियामक संस्थाएं अक्सर गुणवत्ता की जगह केवल कागजी नियमों को प्राथमिकता देती हैं। कई राज्यों ने विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ा दी, लेकिन संसाधनों और शोध पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया। नए बड़े कैंपस और विदेशी सहयोग के दावे संस्थानों को चमकदार दिखाते हैं, जबकि वास्तविक अकादमिक मजबूती शुरुआती स्तर पर ही रहती है।
दिखावा और ब्रैंडिंग की दौड़
आज के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में आधुनिकता और तकनीक का मेल आकर्षक माना जाता है। प्राइवेट संस्थान AI और डिजिटल टेक्नोलॉजी जैसे कार्यक्रमों को प्रदर्शित करके खुद को भविष्य के लिए तैयार दिखाते हैं। लेकिन असली इनोवेशन तभी होता है जब शोध, अच्छे शिक्षक और विषयों के बीच संवाद हो। बिना इन पहलुओं के, सम्मेलन और कार्यक्रम केवल संस्थान की छवि सुधारने का माध्यम बन जाते हैं।
ब्रिटिश लेखक पीटर फ्लेमिंग ने अपनी किताब “Academia: How Universities Die” में ऐसे संस्थानों को जॉम्बी यूनिवर्सिटी कहा है, जो बाहरी रूप से सक्रिय दिखते हैं, लेकिन अंदर से खोखले होते हैं। भारत में स्थिति और जटिल है, क्योंकि यहां बाजार, सरकार और समाज की उम्मीदें विश्वविद्यालयों पर दबाव बनाती हैं। यूनिवर्सिटी केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि ब्रैंड और पहचान बनाने का स्थान भी बन रही हैं।

मीडिया और मार्केटिंग का प्रभाव
मीडिया भी इस बदलाव को बढ़ावा देता है। बड़ी इमारतों, उद्घाटन समारोह और तकनीकी उपलब्धियों को प्रमुखता दी जाती है, जबकि शोध और अकादमिक प्रदर्शन पर चर्चा कम होती है। फीस पर निर्भर प्राइवेट यूनिवर्सिटी इस प्रचार में सबसे अधिक सक्रिय होती हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा और मार्केटिंग के बीच फासला कम हो गया है, और रैंकिंग, प्लेसमेंट तथा बड़े कैंपस ही गुणवत्ता के पैमाने बन गए हैं।
वर्तमान संकट किसी एक संस्था की गलती नहीं है, बल्कि नीतियों और प्रबंधन का संयुक्त परिणाम है। विश्वविद्यालयों की साख केवल अच्छे काम से बनती है। इसके लिए तीन प्रमुख चीजें जरूरी हैं:
- अच्छे शिक्षक और प्रशिक्षित स्टाफ
- शोध और अकादमिक निवेश
- स्वतंत्र और पारदर्शी प्रशासन
संख्या और इमारतों के बजाय अब गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। असल सवाल यह नहीं कि गलगोटिया यूनिवर्सिटी में विवाद क्यों हुआ, बल्कि यह है कि क्या हमारी उच्च शिक्षा संस्थाएं ज्ञान, शोध और लोकतंत्र की मजबूत नींव देने में सक्षम हैं। अगर दिखावा बढ़ता रहा और मूल शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया, तो ये यूनिवर्सिटी केवल चमकदार दिखाई देंगी, लेकिन समाज और छात्रों के लिए उनकी वास्तविक उपयोगिता खो जाएगी।












