मिडिल ईस्ट तनाव के बीच भारत और ईरान अपने संबंधों में ‘स्ट्रेटेजिक पेशेंस’ की नीति बनाए हुए हैं। विदेश मंत्रियों की हालिया बातचीत में क्षेत्रीय हालात, चाबहार पोर्ट और द्विपक्षीय सहयोग को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।
India-Iran Relations: मिडिल ईस्ट की जटिल जियोपॉलिटिक्स के बीच भारत और ईरान के रिश्ते लंबे समय से संतुलन और ‘स्ट्रेटेजिक पेशेंस’ यानी सामरिक धैर्य का उदाहरण माने जाते हैं। एक तरफ भारत के अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते रणनीतिक संबंध हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान भी नई दिल्ली के साथ रिश्तों को बनाए रखने और मजबूत करने की नीति पर कायम है।
हाल ही में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत ने एक बार फिर इस रिश्ते की अहमियत को सामने रखा है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर और ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची के बीच फोन पर हुई चर्चा में दोनों देशों ने क्षेत्रीय हालात और द्विपक्षीय संबंधों पर विस्तार से बात की।
विदेश मंत्रियों की बातचीत से मिला संकेत
एस जयशंकर ने इस बातचीत को हाल के घटनाक्रमों पर ‘डिटेल चर्चा’ बताया और कहा कि दोनों देश संपर्क में बने रहने पर सहमत हुए हैं। वेस्ट एशिया में बढ़ते तनाव के बीच यह बातचीत काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
यह वेस्ट एशिया संकट शुरू होने के बाद दोनों नेताओं के बीच तीसरी बातचीत थी। खास बात यह है कि यह बातचीत उस समय हुई जब ईरान में नेतृत्व से जुड़ा बड़ा बदलाव हुआ। अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद मोजतबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर नियुक्त किया गया है।
तेहरान का संतुलित बयान
बातचीत के बाद ईरान की ओर से एक विस्तृत बयान जारी किया गया जिसमें अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई की कड़ी आलोचना की गई। हालांकि इस बयान में भारत के खिलाफ किसी तरह की कठोर भाषा का इस्तेमाल नहीं किया गया।

बयान में यह भी कहा गया कि भारतीय विदेश मंत्री ने दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों को जारी रखने और उन्हें मजबूत बनाने के महत्व पर जोर दिया। साथ ही क्षेत्र में स्थिरता बहाल करने के लिए लगातार बातचीत की आवश्यकता पर भी सहमति जताई गई।
भारत की संतुलित विदेश नीति
भारत लंबे समय से वेस्ट एशिया में संतुलित विदेश नीति अपनाता रहा है। नई दिल्ली एक तरफ इजरायल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है तो दूसरी तरफ ईरान के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते भी बनाए हुए है।
भारत की नीति का मुख्य आधार किसी एक पक्ष का खुला समर्थन करने के बजाय संवाद बनाए रखना है। यही वजह है कि क्षेत्रीय तनाव के बावजूद भारत कई देशों के साथ रिश्ते संतुलित रख पाता है। ईरान भी इस नीति को समझता है और भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखता है जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर संतुलित और संवाद आधारित रुख अपनाता है।
चाबहार पोर्ट की रणनीतिक अहमियत
भारत और ईरान के रिश्तों में चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट एक अहम कड़ी है। यह बंदरगाह केवल व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। चाबहार पोर्ट भारत को अफगानिस्तान और सेंट्रल एशिया तक सीधी पहुंच देने में मदद करता है। इससे पाकिस्तान को बायपास करते हुए क्षेत्रीय व्यापार को बढ़ावा देने का रास्ता खुलता है।
हालांकि अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों के कारण इस परियोजना की गति कई बार धीमी हुई है। इसके बावजूद ईरान ने सार्वजनिक रूप से भारत की आलोचना करने से परहेज किया है। ईरानी विदेश मंत्री ने एक इंटरव्यू में भारत के कम निवेश को दोनों पक्षों के लिए निराशाजनक बताया, लेकिन साथ ही उम्मीद जताई कि भविष्य में यह सहयोग जारी रहेगा।
ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा रिश्ता
भारत दुनिया के सबसे बड़े ऊर्जा बाजारों में से एक है और ईरान तेल और गैस के बड़े उत्पादकों में शामिल है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच ऊर्जा व्यापार लंबे समय तक रिश्तों की मजबूत कड़ी रहा है।

2019 में अमेरिका के प्रतिबंधों से पहले भारत अपने कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 10 प्रतिशत ईरान से खरीदता था। प्रतिबंधों के बाद यह व्यापार लगभग रुक गया, लेकिन भविष्य में इसके फिर से शुरू होने की संभावना बनी हुई है।
भारतीय डायस्पोरा भी अहम कारक
वेस्ट एशिया में रहने वाले भारतीयों की बड़ी संख्या भी भारत की विदेश नीति को प्रभावित करती है। खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय काम करते हैं और वहां से भारत को बड़ी मात्रा में रेमिटेंस मिलता है। यदि इस क्षेत्र में बड़ा संघर्ष होता है तो इसका असर सीधे भारतीय नागरिकों और भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसलिए भारत इस क्षेत्र में स्थिरता और शांति बनाए रखने पर जोर देता है।
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध
भारत और ईरान के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच हजारों साल पुराने सांस्कृतिक और सभ्यतागत रिश्ते हैं।
फारसी और भारतीय सभ्यताओं के बीच भाषा, संस्कृति और परंपराओं में कई समानताएं रही हैं। इतिहास में फारसी भाषा का भारत की प्रशासनिक और सांस्कृतिक व्यवस्था पर गहरा प्रभाव रहा है। आधुनिक समय में भी दोनों देशों ने इन ऐतिहासिक संबंधों को कूटनीतिक सहयोग के रूप में आगे बढ़ाया है।
आधुनिक कूटनीति के महत्वपूर्ण पड़ाव
भारत की आजादी के बाद 1950 में दोनों देशों ने फ्रेंडशिप ट्रीटी के जरिए अपने संबंधों को औपचारिक रूप दिया। इसके बाद 2001 का तेहरान डिक्लेरेशन और 2003 का नई दिल्ली डिक्लेरेशन दोनों देशों के रिश्तों में महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुए।
2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ईरान दौरे और 2018 में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी के भारत दौरे के दौरान भी कई महत्वपूर्ण समझौते हुए। इन समझौतों का फोकस कनेक्टिविटी, व्यापार और क्षेत्रीय सहयोग पर रहा। मई 2025 में ईरानी विदेश मंत्री अराघची का नई दिल्ली दौरा भी इसी दिशा में एक अहम कदम माना गया, जहां उन्होंने भारत-ईरान जॉइंट कमीशन मीटिंग की सह-अध्यक्षता की।











