श्वेता बसु प्रसाद: OTT के आने के बाद अब महिलाओं को वैंप या सती-सावित्री नहीं दिखाया जाता

श्वेता बसु प्रसाद: OTT के आने के बाद अब महिलाओं को वैंप या सती-सावित्री नहीं दिखाया जाता

फिल्म 'मकड़ी' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी अदाकारा श्वेता बसु प्रसाद इन दिनों ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। इस साल उन्होंने वेब सीरीज 'ऊप्स अब क्या' और 'क्रिमिनल जस्टिस 4' में अपनी अदाकारी के लिए खूब सराहना पाई।

एंटरटेनमेंट न्यूज़: बॉलीवुड की चाइल्ड आर्टिस्ट से लेकर अब एक मजबूत महिला किरदारों की प्रमुख अदाकारा बनी श्वेता बसु प्रसाद अपनी बहुप्रतीक्षित वेब सीरीज ‘महारानी सीजन 4’ में मुख्यमंत्री रोशनी भारती की भूमिका निभाते हुए नजर आएंगी। राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता श्वेता ने अपने लंबे सफर और स्क्रीन पर महिलाओं के बदलते चित्रण पर खुलकर बातचीत की।

स्क्रीन पर मजबूत महिला किरदारों की तलाश

श्वेता बसु प्रसाद ने बताया कि उनके अधिकांश किरदार मजबूत महिलाओं के ही होते हैं, लेकिन यह उनकी पूर्वनिर्धारित पसंद नहीं होती। उनका मानना है कि कलाकार का काम समाज के हर पहलू को दिखाना है। उन्होंने कहा,

'मेरी कोशिश ये होती है कि मैं अलग-अलग तरह के किरदार निभाऊँ, ताकि दर्शक महसूस करें कि ये किरदार उनकी बहन, बेटी या दोस्त की तरह है। अब ओटीटी की वजह से महिलाएं सिर्फ सती-सावित्री या वैंप की तरह नहीं दिखाई जातीं।'

श्वेता ने अपने पिछली सीरीज और फिल्मों के उदाहरण देते हुए कहा कि चाहे किरदार भोला-भाला हो या मज़बूत, अब महिलाओं के रोल अधिक लेयर्ड और वास्तविक बन गए हैं। उन्होंने जामुन, कॉमेडी कपल और जुबिली जैसी वेब सीरीज का जिक्र करते हुए बताया कि हर किरदार में महिलाओं की सशक्त मौजूदगी दिखती है।

स्टीरियोटिपिकल रोल अब पीछे

श्वेता ने स्वीकार किया कि पहले फिल्मों और शो में महिलाओं को सिर्फ दो प्रकार के किरदार दिए जाते थे—सती-सावित्री या वैंप। अब बदलाव आया है। उन्होंने कहा, इंडिया लॉकडाउन में मैंने एक ऐसी प्रॉस्टिट्यूट का रोल निभाया, जो अपने काम को लेकर बहुत अनअपॉलिजेटिक थी। वह कमजोर या बेचारी नहीं थी। इसी तरह ‘त्रिभुवन मिश्रा सीए टॉपर’ में मैं साड़ी पहनकर बंदूक चलाती हूं। ऐसे किरदारों में मज़ा आता है, और मैं हर तरह के रोल करने के लिए तैयार हूं।

‘महारानी 4’ में सीएम रोशनी और रानी को घर और सत्ता दोनों में संघर्ष करना पड़ता है। श्वेता ने कहा कि इंडस्ट्री और राजनीति दोनों ही पुरुष प्रधान हैं। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि ऐसे हालातों में चुप रहना हमेशा समाधान नहीं होता। अगर आप सही हैं, तो बोलना चाहिए। लेकिन अगर सामने वाला सिर्फ मूर्ख है, तो अपनी एनर्जी व्यर्थ नहीं करनी चाहिए। यह व्यक्तिगत चुनाव है कि कहां लड़ना है, कहां इग्नोर करना है।

मुख्यमंत्री का रोल और असल जीवन में बदलाव की सोच

श्वेता बसु प्रसाद ने कहा कि अगर उन्हें असल जिंदगी में ऐसी शक्ति मिलती तो वह शिक्षा, भोजन और सुरक्षा के साथ-साथ आर्ट, साइंस, फिलॉसफी और म्यूजिक को अनिवार्य शिक्षा में शामिल करना चाहेंगी। उनका मानना है कि कला न केवल सोचने की शक्ति देती है, बल्कि समाज में सौहार्द और तर्कशीलता बढ़ाती है।

कला हमारे समय को डॉक्यूमेंट करती है। चाहे यह मुगल मिनिएचर आर्ट हो, टेंपल आर्ट, केव पेंटिंग या आधुनिक संगीत। आर्ट एक पॉज है, जो हमें ठहराव और सोचने का समय देती है। श्वेता ने आगे कहा कि आज के समय में जहां स्क्रीन टाइम बढ़ गया है और लोग दूसरों की वैलिडेशन के पीछे भाग रहे हैं, वहां कला और संगीत संतुलन और ठहराव देने का काम करते हैं।

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