प्रभास और संजय दत्त स्टारर फिल्म ‘द राजा साब’ आखिरकार सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। हॉरर-कॉमेडी और फैंटेसी के मिश्रण के तौर पर पेश की गई यह फिल्म बड़े बजट, भव्य सेट और नामी कलाकारों के बावजूद दर्शकों की उम्मीदों पर खरी उतरती नहीं दिखती।
- Movie Review: द राजा साब
- कलाकार: प्रभास , संजय दत्त , निधि अग्रवाल , मालविका मोहनन , रिद्धि कुमार , बोमन ईरानी और जरीना वहाब
- लेखक: मारुति
- निर्देशक: मारुति
- निर्माता: टी.जी. विश्व प्रसाद
- रिलीज: 9 जनवरी 2026
- रेटिंग: 2/5
The Raja Saab Review: ‘द राजा साब’ को हॉरर-फैंटेसी-कॉमेडी के रूप में पेश किया गया है, लेकिन हकीकत में यह फिल्म जॉनर को लेकर उलझी हुई, बिखरी और जरूरत से ज्यादा लंबी नजर आती है। प्रभास जैसे बड़े स्टार और मारुति जैसे अनुभवी निर्देशक के बावजूद फिल्म यह तय नहीं कर पाती कि वह आखिर बनना क्या चाहती है। बड़े सेट, भारी बजट और तामझाम के बावजूद मजबूत कंटेंट की कमी साफ झलकती है, जिससे फिल्म का असर कमजोर पड़ जाता है।
कहानी: आइडिया अच्छा, ट्रीटमेंट कमजोर
फिल्म की कहानी सुनने में रोचक लगती है, लेकिन स्क्रीन पर आते-आते उलझ जाती है। राजा (प्रभास) अपनी अल्जाइमर से पीड़ित दादी गंगम्मा (जरीना वहाब) की एक जिद को सच मान लेता है—कि उनके पति कंकराजू (संजय दत्त) अभी जिंदा हैं। इसी विश्वास के चलते राजा उनकी तलाश में निकलता है और पहुंचता है हैदराबाद की एक रहस्यमयी पुरानी हवेली में, जहां आत्माएं, तंत्र-मंत्र और अतीत के कई खौफनाक राज छिपे हैं।
समस्या यह नहीं कि कहानी में दम नहीं है, बल्कि यह है कि फिल्म खुद तय नहीं कर पाती कि उसे डर पैदा करना है, हंसाना है या भावुक करना है। पहले आधे घंटे में इमोशनल ड्रामा चलता है, फिर अचानक कॉमेडी शुरू हो जाती है और उसके बाद जबरन हॉरर ठूंस दिया जाता है। कई दृश्य ऐसे हैं जिनका आगे की कहानी से कोई ठोस संबंध नहीं बनता। क्लाइमैक्स तक आते-आते फिल्म इतनी थक चुकी होती है कि दर्शक न डर महसूस करते हैं, न ही कोई रोमांच।
अभिनय: संजय दत्त मजबूत, प्रभास कमजोर
प्रभास इस फिल्म में अपनी एक्शन-हीरो वाली छवि से हटकर कॉमिक रोल निभाने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रिप्ट और ढीले संवाद उनके प्रयासों को नुकसान पहुंचाते हैं। कॉमेडी सीन्स में उनका अभिनय कई बार ओवरएक्टिंग की तरफ चला जाता है, जिससे दृश्य बनावटी लगते हैं। हॉरर सीन्स में भी न तो डर नजर आता है और न ही गंभीरता। यह भूमिका प्रभास के करियर की यादगार भूमिकाओं में शामिल नहीं हो पाती।
इसके उलट, संजय दत्त फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हैं। उनका रहस्यमयी और सायकोलॉजिकल किरदार प्रभाव छोड़ता है। बोमन ईरानी सीमित स्क्रीन टाइम में भी असरदार साबित होते हैं। जरीना वहाब दादी के रोल में सधी हुई और भावनात्मक लगती हैं। हालांकि मालविका मोहनन, निधि अग्रवाल और रिद्धि कुमार जैसे किरदार सिर्फ ग्लैमर और गानों तक सीमित रह जाते हैं और कहानी पर उनका खास असर नहीं पड़ता।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष
निर्देशक मारुति का निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बनकर उभरता है। हॉरर, कॉमेडी, फैंटेसी और इमोशन—सब कुछ एक ही फिल्म में डालने की कोशिश की गई है, लेकिन किसी भी जॉनर पर पकड़ नहीं बन पाती। डरावने सीन डराते नहीं, कॉमेडी हंसाती नहीं और इमोशनल पल जल्दी ही बनावटी लगने लगते हैं।
बैकग्राउंड म्यूजिक माहौल बनाने में नाकाम रहता है। गाने कहानी की रफ्तार तोड़ते हैं। VFX और ग्रीन-स्क्रीन का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल कई जगह टीवी-सीरियल जैसा अहसास देता है, जो इतने बड़े बजट वाली फिल्म के लिए निराशाजनक है। एडिटिंग भी ढीली है, जिससे फिल्म जरूरत से ज्यादा लंबी लगती है।
पॉजिटिव पॉइंट्स
फिल्म में कुछ पल ऐसे जरूर हैं जो असर छोड़ते हैं। प्रभास लंबे समय बाद कॉमिक रोल में दिखते हैं और कुछ दृश्य हल्की मुस्कान ला देते हैं। जरीना वहाब की एक्टिंग ईमानदार है। संजय दत्त के किरदार का सायकोलॉजिकल एंगल दिलचस्प लगता है। दूसरे हाफ में बोमन ईरानी और संजय दत्त से जुड़े कुछ सीन, खासकर हॉस्पिटल वाला इमोशनल सीन, फिल्म को थोड़ी देर के लिए संभालते हैं।
देखें या नहीं?
अगर आप प्रभास के कट्टर फैन हैं, तो जिज्ञासा के चलते एक बार फिल्म देख सकते हैं। लेकिन अगर आप सशक्त कहानी, असली हॉरर या ठोस कॉमेडी की तलाश में हैं, तो ‘द राजा साब’ आपको निराश कर सकती है। बड़े बजट और बड़े नामों के बावजूद यह फिल्म एक मिस्ड ऑपर्च्युनिटी साबित होती है—नाम बड़े, दर्शन छोटे।









