वृंदावन से मोहन भागवत का आह्वान, बोले- हिंदू समाज की एकता जरूरी

वृंदावन से मोहन भागवत का आह्वान, बोले- हिंदू समाज की एकता जरूरी

मथुरा के वृंदावन में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने हिंदू समाज की एकता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि सनातन समाज के संगठित होने से आसुरी शक्तियां कमजोर होंगी और भारत धर्म, करुणा व सत्य के आधार पर आगे बढ़ेगा।

New Delhi: मथुरा के वृंदावन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने हिंदू समाज की एकता को लेकर बड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि जैसे जैसे सनातन समाज एकजुट होता जाएगा, वैसे वैसे समाज विरोधी और आसुरी शक्तियां अपने आप कमजोर होती जाएंगी। भागवत का यह बयान न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।

यह संबोधन वृंदावन स्थित सुदामा कुटी आश्रम के संस्थापक संत सुदामा दास जी महाराज के 10 दिवसीय शताब्दी महोत्सव के उद्घाटन अवसर पर दिया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में संत, महंत और श्रद्धालु मौजूद रहे।

हिंदू एकता से ही टूटी हैं विभाजनकारी ताकतें

मोहन भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि पिछले 50 वर्षों में भारत ने यह स्पष्ट रूप से देखा है कि जैसे जैसे हिंदू समाज एक होता गया, वैसे वैसे समाज को तोड़ने वाली ताकतें कमजोर होती चली गईं। उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को कभी किसी बाहरी शक्ति ने नहीं हराया। जब भी पराजय हुई, वह आपसी फूट और विभाजन के कारण हुई।

भागवत ने जोर देकर कहा कि समाज में अगर एकता बनी रहे, आपसी विश्वास और अपनापन बना रहे, तो कोई भी शक्ति भारत को कमजोर नहीं कर सकती। उनके अनुसार आज जो शक्तियां समाज को भ्रमित करने की कोशिश कर रही हैं, वे अंदर से खोखली हो चुकी हैं।

हमारा राष्ट्र धर्म के लिए बना

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि भारत का निर्माण किसी राजनीतिक उद्देश्य के लिए नहीं, बल्कि धर्म के लिए हुआ है। उन्होंने कहा कि यह राष्ट्र इसलिए बना ताकि समय समय पर दुनिया को धर्म का ज्ञान दिया जा सके और अपने आचरण से यह बताया जा सके कि धर्म आधारित जीवन कैसे जिया जाता है।

भागवत ने कहा कि भारत का दायित्व केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के लिए है। भारत को अपने जीवन, व्यवहार और सोच से यह उदाहरण प्रस्तुत करना होगा कि करुणा, सत्य और सुचिता के आधार पर समाज कैसे आगे बढ़ता है।

भेदभाव मुक्त भारत की आवश्यकता

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने भेदभाव मुक्त भारत की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश को आज ऐसे समाज की जरूरत है, जहां किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो। भाषा, जाति, पंथ या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव समाज को कमजोर करता है।

उन्होंने कहा कि हिंदू समाज मूल रूप से सामाजिक है। दुनिया हिंदुओं को अनेक रूपों में देखती है, अलग अलग भाषा, पंथ और परंपराओं के रूप में। ऐसे में हमारा मित्र वृत्त भी उतना ही व्यापक होना चाहिए। हर व्यक्ति को अपना मानने की भावना ही हिंदू समाज की सबसे बड़ी ताकत है।

भक्ति को बताया सबसे बड़ी शक्ति

शताब्दी महोत्सव को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने भक्ति को शक्ति का स्वरूप बताया। उन्होंने कहा कि भक्ति केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि जुड़ाव और अपनापन ही भक्ति का असली स्वरूप है।

उन्होंने कहा कि सत्संग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमें जोड़ता है। जो लोग जुड़े हुए हैं, जिनका बाकी सब छूट गया है, उनकी संगति में रहकर व्यक्ति स्वयं भी धीरे धीरे बेहतर बनता है। भक्ति व्यक्ति के भीतर आत्मिक शक्ति का विकास करती है और समाज को दिशा देती है।

सत्य और करुणा पर खड़ा भारत अजेय है

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि अगर भारत सत्य, करुणा और सुचिता के आधार पर खड़ा है, तो दुनिया की कोई भी शक्ति उसे पराजित नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि संतों की तपस्या और मार्गदर्शन की छाया में खड़ा समाज कभी मिटाया नहीं जा सकता।

भागवत ने विश्वास जताया कि ऐसी कोई कठिनाई नहीं है जिसे दूर न किया जा सके। उन्होंने कहा कि अगर समाज संगठित हो जाए, तो वह पूरी दुनिया को धर्म के प्रकाश से आलोकित कर सकता है।

आज की चुनौतियां और समाज की तैयारी

मोहन भागवत ने कहा कि आज की परिस्थितियां नई नहीं हैं। ऐसी स्थितियां पहले भी आई हैं, लेकिन आज समाज पूरी तरह तैयार नहीं है, इसलिए चुनौतियां सामने नाचती हुई दिखाई दे रही हैं। उन्होंने कहा कि समाज को आत्मिक और वैचारिक रूप से मजबूत बनाने की जरूरत है।

उनका कहना था कि जो शक्तियां आज सक्रिय दिखाई दे रही हैं, वे वास्तव में कमजोर हो चुकी हैं। पूरी दुनिया में उनकी असफलता सामने आ चुकी है। केवल समाज को धैर्य और विश्वास के साथ आगे बढ़ना है।

अगले 20-30 साल में भारत विश्व गुरु

अपने संबोधन के अंत में मोहन भागवत ने भविष्य को लेकर बड़ा दावा किया। उन्होंने कहा कि अगर समाज संतों के उपदेशों को अपने आचरण में उतार ले, संतसंग को जीवन का हिस्सा बना ले और सबको जोड़ने की भावना के साथ आगे बढ़े, तो आने वाले 20 से 30 वर्षों में भारत विश्व गुरु बनेगा।

उन्होंने कहा कि भारत एक हिंदू राष्ट्र और धर्म राष्ट्र के रूप में पूरी दुनिया को सुख और शांति का मार्ग दिखाएगा। कोई भी शक्ति भारत के इस उद्देश्य को रोक नहीं सकती, क्योंकि यही भारत के जन्म का प्रयोजन है।

समाज से जुड़ने का आह्वान

मोहन भागवत ने समाज से अपील की कि केवल सुनने तक सीमित न रहें, बल्कि जो उपदेश मिले हैं, उन्हें अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। बार बार सुनें, समझें और अपने आचरण में बदलाव लाएं।

उन्होंने कहा कि जब हर व्यक्ति स्वयं को बदलने की दिशा में आगे बढ़ेगा, तभी समाज मजबूत बनेगा और राष्ट्र अपने उद्देश्य की ओर बढ़ेगा। अगर आप ऐसे ही राष्ट्र, समाज और धर्म से जुड़े महत्वपूर्ण विचार और खबरें पढ़ना चाहते हैं, तो इस खबर को शेयर करें और हमारे साथ जुड़े रहें।

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