80% बर्फ वाले द्वीप पर नियंत्रण के लिए अमेरिका की तैयारी, क्या वेनेजुएला जैसा होगा हाल?

80% बर्फ वाले द्वीप पर नियंत्रण के लिए अमेरिका की तैयारी, क्या वेनेजुएला जैसा होगा हाल?

अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिकी क्षेत्र में शामिल करने की इच्छा जताई। इसके लिए सैन्य विकल्प भी तैयार हैं। रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ग्रीनलैंड में अमेरिका के बेस, खनिज संसाधन और आर्कटिक नियंत्रण का महत्व है।

Greenland Issue: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका में शामिल करने की इच्छा फिर से जाहिर की है। उन्होंने इसे अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी बताया है। हाल ही में 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला पर अमेरिकी मिलिट्री ऑपरेशन के बाद ट्रंप की यह इच्छा अब और गंभीरता से देखी जा रही है। उस ऑपरेशन में अमेरिकी फोर्सेस ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया।

ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए सैन्य कार्रवाई भी विकल्प के तौर पर तैयार है। व्हाइट हाउस ने कहा कि कोई भी अमेरिका के ग्रीनलैंड के भविष्य पर चुनौती नहीं दे सकता। डिप्टी चीफ ऑफ स्टाफ स्टीफन मिलर ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय नियमों को अब ‘आयरन लॉ’ माना जाता है, क्योंकि दुनिया ताकत और पावर पर आधारित है।

ग्रीनलैंड की रणनीतिक अहमियत

ग्रीनलैंड आर्कटिक में एक बर्फीला बड़ा द्वीप है और डेनमार्क का सेमी-ऑटोनॉमस टेरिटरी है। इसकी भू-राजनीतिक और सैन्य अहमियत बहुत ज्यादा है।

सबसे पहले, यह अटलांटिक समुद्री रास्तों की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। ग्रीनलैंड अमेरिका, यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए अहम बिंदु है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस मौजूद है। यह बेस रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखने में मदद करता है।

दूसरा, अमेरिका चीन और रूस की बढ़ती आर्कटिक गतिविधियों पर नजर रखना चाहता है। ग्रीनलैंड पर नियंत्रण से वह इस क्षेत्र में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत कर सकता है।

तीसरा, ग्रीनलैंड में मिसाइल डिटेक्शन बेस है। इसे अमेरिका अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की फ्रंट लाइन मानता है। यहां प्रभाव बढ़ाकर संभावित खतरों को पहले ही रोका जा सकता है।

चौथा, ग्लोबल वार्मिंग की वजह से आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है और नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। अमेरिका इन रूट्स पर प्रभुत्व बनाए रखना चाहता है ताकि रूस और चीन की बढ़त रोकी जा सके।

पाँचवा, ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स मौजूद हैं। ये भविष्य में आर्थिक और तकनीकी रूप से बहुत महत्वपूर्ण हैं। चीन इन खनिजों के उत्पादन का 70-90 प्रतिशत नियंत्रित करता है। अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।

ट्रंप का ग्रीनलैंड के प्रति उत्साह

ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में भी ग्रीनलैंड खरीदने की बात कही थी, लेकिन इसे मजाक समझा गया। वेनेजुएला ऑपरेशन के बाद यह गंभीर हो गया है। ट्रंप ने लुइसियाना के गवर्नर जेफ लैंड्री को ग्रीनलैंड के लिए स्पेशल एनवॉय भी बनाया है।

ट्रंप इसे 21वीं सदी का एम्पायर बिल्डिंग प्रोजेक्ट मानते हैं। उनका उद्देश्य वेस्टर्न हेमिस्फेयर पर पूरी पकड़ बनाना है। वे इसे 19वीं सदी की तरह मान रहे हैं, जैसे जेफरसन ने लुइसियाना खरीदा या विलियम मैकिनले ने हवाई को जोड़ा।

वेनेजुएला ऑपरेशन का कनेक्शन

3 जनवरी 2026 को अमेरिकी स्पेशल फोर्सेस ने वेनेजुएला में मादुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार किया और न्यूयॉर्क ले आए। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका अब वेनेजुएला को ‘रन’ कर रहा है। अंतरिम सरकार अमेरिका को 50 मिलियन बैरल तक सैंक्शन वाले तेल देगी। इसका फायदा अमेरिकी और वेनेजुएला दोनों लोगों के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

यूरोप और अन्य देशों की प्रतिक्रिया

ग्रीनलैंड पर ट्रंप की इच्छा ने यूरोपीय देशों को चिंतित कर दिया है। डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट्टे फ्रेडरिकसेन ने कहा कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है और कोई बल प्रयोग NATO को कमजोर करेगा। फ्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, इटली, पोलैंड और स्पेन समेत कई देशों ने संयुक्त बयान जारी कर ग्रीनलैंड की संप्रभुता का समर्थन किया।

कनाडा के प्रधानमंत्री ने भी ग्रीनलैंड के लिए हाई-लेवल टीम भेजने की बात कही।

अमेरिका की नीतियों में संभावित बदलाव

CNN के स्टीफन कोलिंसन के अनुसार अमेरिका पहले से NATO के तहत ग्रीनलैंड में बेस रखता है। खरीदने या कब्जे की जरूरत नहीं, लेकिन ट्रंप पूरा कंट्रोल चाहते हैं। रिटायर्ड एडमिरल जेम्स स्टाव्रिडिस ने चेतावनी दी कि यह NATO का अंत हो सकता है। सीनेटर क्रिस मर्फी ने कहा कि अब ट्रंप की सोच को गंभीरता से लेना होगा।

हालांकि ग्रीनलैंड को हासिल करने के लिए कांग्रेस, यूरोपीय यूनियन और डेनमार्क की मंजूरी जरूरी है। इस डील की लागत सैकड़ों अरब डॉलर हो सकती है। फिलहाल तत्काल सैन्य कार्रवाई नहीं दिख रही, लेकिन ट्रंप की गतिविधियों ने दुनिया को चिंतित कर दिया है। यह अमेरिकी विदेश नीति में संभावित बड़ा बदलाव दर्शाता है।

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