बांग्लादेश में शेख हसीना के इस्तीफे को लेकर राजनीतिक सस्पेंस बढ़ गया है। राष्ट्रपति शहाबुद्दीन और जमात-ए-इस्लामी के बयानों ने सरकार की वैधता और संवैधानिक बहस को केंद्र में ला दिया है।
Dhaka: बांग्लादेश की राजनीति इन दिनों किसी थ्रिलर फिल्म जैसी दिख रही है। शेख हसीना के देश छोड़ने के महीनों बाद भी उनके इस्तीफे का पत्र और सरकार की कानूनी वैधता को लेकर विवाद जारी है। इस घमासान में राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन और कट्टरपंथी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के बीच सख्त विवाद सामने आया है।
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन ने हाल ही में एक इंटरव्यू में तत्कालीन मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर तीखे आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि यूनुस सरकार ने कई फैसलों में संविधान का उल्लंघन किया और उन्हें नजरबंद कर दिया गया। राष्ट्रपति ने दावा किया कि उन्हें इलाज के लिए विदेश जाने से रोका गया और कई बार पद से हटाने की कोशिश की गई।
राष्ट्रपति शहाबुद्दीन का सनसनीखेज दावा
राष्ट्रपति ने कहा कि यूनुस सरकार ने अमेरिका के साथ गुप्त व्यापार समझौते किए और उन्हें इसके बारे में जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस दौरान वह केवल सेना और विपक्षी पार्टी BNP के समर्थन पर निर्भर थे। राष्ट्रपति के इन बयानों ने बांग्लादेश की राजनीतिक दुनिया में हलचल पैदा कर दी है।
इसके बाद जमात-ए-इस्लामी के प्रमुख शफीकुर रहमान ने फेसबुक पर राष्ट्रपति के बयान पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने राष्ट्रपति को कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल उठाया कि उन्होंने पहले कहा था कि हसीना का इस्तीफा मिल गया, लेकिन अब वह इसे न मिलने की बात कह रहे हैं।

गायब इस्तीफे की मिस्ट्री
शेख हसीना का इस्तीफा इस पूरी कहानी का केंद्र बन गया है। अगस्त 2024 में राष्ट्रपति ने टीवी पर कहा था कि उन्हें हसीना का इस्तीफा मिल गया। लेकिन अक्टूबर 2024 में उन्होंने कहा कि इस्तीफा नहीं मिला और शायद शेख हसीना को साइन करने का समय ही नहीं मिला।
जमात-ए-इस्लामी और यूनुस सरकार इस घुमावदार बयानबाजी को लेकर राष्ट्रपति को घेर रहे हैं। यदि इस्तीफा नहीं है, तो वर्तमान सरकार की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। यही वजह है कि बांग्लादेश में राजनीतिक सस्पेंस और संवैधानिक बहस तेज होती जा रही है।
यूनुस सरकार और जमात-ए-इस्लामी का नेक्सस
बांग्लादेश की गलियों में चर्चा है कि शेख हसीना को हटाने के पीछे जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन 'छात्र शिविर' की भूमिका रही। 2026 के चुनावों से पहले यह साफ दिख रहा है कि आंदोलनकारी छात्र नेता अब जमात के करीब जा रहे हैं।
कुछ छात्र नेता अब यूनुस की कैबिनेट में मंत्री बनकर काम कर रहे हैं। इस स्थिति में राष्ट्रपति का कहना कि वह केवल सेना और BNP के समर्थन पर टिके हैं, बांग्लादेश की सत्ता संघर्ष की जटिलता को उजागर करता है।
बांग्लादेश में फिलहाल संविधान और वास्तविक राजनीतिक हालात के बीच जंग चल रही है। एक तरफ यूनुस सरकार है जो छात्र आंदोलनों से उठकर सत्ता में आई है, तो दूसरी तरफ राष्ट्रपति हैं जिन्हें शेख हसीना ने नियुक्त किया था।










