भारत-रूस मिलकर बनाएंगे बड़े-बड़े जहाज, व्यापार और रक्षा सहयोग को मिलेगा नया बल

भारत-रूस मिलकर बनाएंगे बड़े-बड़े जहाज, व्यापार और रक्षा सहयोग को मिलेगा नया बल

भारत और रूस के बीच रणनीतिक और आर्थिक सहयोग नई दिशा ले रहा है। दोनों देशों की कंपनियां बड़े जहाज निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी, अक्षय ऊर्जा, धातु विज्ञान और तेल रिफाइनिंग के क्षेत्रों में साझेदारी पर चर्चा कर रही हैं। 

India-Russia Ship Building: भारत और रूस की दोस्ती अब एक नए स्तर पर पहुंचती दिख रही है, जो केवल हथियारों और तेल की आपूर्ति तक सीमित नहीं रहेगी। अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीद पर सख्त टैरिफ लगाने के बीच भारत और रूस ने सहयोग के नए क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है। रूस की कई कंपनियों ने भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर बड़े जहाजों के निर्माण, सूचना प्रौद्योगिकी, अक्षय ऊर्जा, तेल रिफाइनिंग और धातु विज्ञान जैसे क्षेत्रों में साझेदारी की इच्छा जताई है, जिस पर दोनों देशों के बीच बातचीत जारी है। 

यह पहल ऐसे समय पर हो रही है जब अमेरिका ने रूसी तेल पर प्रतिबंध लगाए हैं और भारत पर भी कड़े टैरिफ लगाए गए हैं। भारत-रूस के इस नए रणनीतिक फोकस से अमेरिका की चिंता और बढ़ सकती है।

अमेरिका की पाबंदियों के बीच रूस-भारत फोकस

अमेरिका ने रूस से तेल खरीद पर सख्त टैरिफ लगा रखे हैं। इस स्थिति में भारत-रूस सहयोग नई संभावनाओं के द्वार खोल रहा है। रूस की कई कंपनियों ने भारत की कंपनियों के साथ लोकल प्रोडक्शन और संयुक्त उद्यमों के लिए अपनी रुचि जताई है। इसका मतलब यह है कि भारत में ही बड़े उद्योग और उत्पादन केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जिससे रोजगार और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ावा मिलेगा।

भारत के रक्षा आयात में रूस का हिस्सा लगभग 45% है। हाल ही में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के दौरे के दौरान दोनों देशों ने सिर्फ आयात-निर्यात तक सीमित नहीं रहते हुए भारत में मिलकर उत्पादन करने पर जोर दिया। इसके अलावा रूस ने भारत को तेल, फर्टिलाइज़र, न्यूक्लियर रिएक्टर और आर्कटिक संसाधनों तक लंबी अवधि की पहुंच की गारंटी दी।

विशेष रूप से भारत को फर्टिलाइज़र और ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए रूस की भूमिका अहम है। इससे भारतीय किसानों और उद्योगों को स्थिरता मिलती है और अमेरिका की टैरिफ पाबंदियों का असर कम होता है।

2030 तक 100 बिलियन डॉलर का लक्ष्य

भारत-रूस आर्थिक सहयोग कार्यक्रम का उद्देश्य 2030 तक सालाना व्यापार मूल्य 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाना है। इसके लिए दोनों देश यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट और वैकल्पिक मुद्रा चैनल बनाने पर काम कर रहे हैं। इस कदम से दोनों देश डॉलर और पश्चिमी वित्तीय नियंत्रण से बचकर व्यापार कर पाएंगे।

रूस के व्यापार प्रतिनिधि आंद्रेई सोबोलेव ने कहा कि भारत और रूस नॉर्दन सी रूट पर सहयोग बढ़ाने की योजना बना रहे हैं। यह आर्कटिक महासागर में रूसी क्षेत्र का मुख्य समुद्री मार्ग है, जो यूरोपीय और सुदूर पूर्वी बंदरगाहों और साइबेरिया की नौकायन योग्य नदियों को जोड़ता है। दोनों देश इस रूट पर स्थायी कार्गो बेस, लॉजिस्टिक्स नेटवर्क और जहाज निर्माण परियोजनाओं पर फोकस कर रहे हैं।

भारतीय कंपनियों की संभावनाएं

FIEO के डायरेक्टर जनरल अजय सहाय ने बताया कि भारत रूस को अपने उत्पाद और सेवाओं के एक्सपोर्ट को दोगुना करके 5 बिलियन डॉलर से 10 बिलियन डॉलर तक बढ़ाने की योजना बना रहा है। उन्होंने कहा कि मैकेनिकल इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, ग्रीन एनर्जी, शिपबिल्डिंग और शिप रिपेयर में भारत के लिए असीम संभावनाएं हैं।

सहाय के अनुसार भारत-रूस व्यापार में संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। भारत को रूस को अपने एक्सपोर्ट बढ़ाने होंगे, जबकि रूस से आवश्यक तेल, फर्टिलाइज़र और तकनीकी आपूर्ति सुनिश्चित की जाएगी।

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