राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने राजस्थान के जैसलमेर में डेडांसर मेला ग्राउंड पर आयोजित दादागुरु चादर महोत्सव के दौरान विश्व में जारी युद्धों और संघर्षों पर अपने विचार साझा किए।
जैसलमेर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख Mohan Bhagwat शुक्रवार को राजस्थान के जैसलमेर पहुंचे। मोहन भागवत डेडांसर मेला ग्राउंड पर परम पूज्य दादा Jindatt Suriji Maharaj के चमत्कारी चादर महोत्सव में शामिल हुए। यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति समागम एवं समरसता का आयोजन है। अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने वर्तमान समय में दुनिया के अनेक क्षेत्रों में जारी युद्ध पर बात की और कहा कि हम अपने एकत्व को पहचानते नहीं हैं, इसलिए झगड़े होते हैं।
एकत्व की कमी ही है युद्ध का मूल कारण
भागवत ने अपने संबोधन में कहा, “जो युद्ध चल रहे हैं, वह थम क्यों नहीं रहे? यह झगड़े क्यों होते हैं? हम अपने एकत्व को पहचानते नहीं हैं। एक नहीं हैं तो अलग हैं, अलग हैं तो अलग-अलग स्वार्थ हैं, और फिर हम अपना स्वार्थ साधने में लग जाते हैं।” उन्होंने स्पष्ट किया कि जब हम अपने भीतर और समाज में एकता का भाव नहीं रखते, तो बाहरी दुनिया में संघर्ष और कलह अनिवार्य रूप से बढ़ते हैं।
वर्तमान समय में इजरायल-अमेरिका और ईरान, रूस-यूक्रेन और अन्य कई क्षेत्रों में जारी युद्धों को उदाहरण के रूप में पेश करते हुए भागवत ने कहा कि यह स्थिति केवल भू-राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक एकता की कमी का परिणाम भी है।

करुणा और सत्य की याद जरूरी
RSS प्रमुख ने कहा कि आज लोग मन की करुणा और सत्य को भूल चुके हैं। भागवत ने जोर देकर कहा,
'हम दिखते अलग-अलग हैं, लेकिन हम सब एक हैं। इसलिए कलह थामते नहीं हैं, युद्ध चलते रहते हैं। पहला महायुद्ध हुआ, उसके बाद लीग ऑफ ने नेशन की स्थापना हुई, फिर दूसरा महायुद्ध हुआ, और इसके बाद यूनाइटेड नेशन की स्थापना हुई, लेकिन हम देख रहे हैं कि हालात कितने विकट हैं।'
उनका मानना है कि केवल संगठन और नीतियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि मानवता, करुणा और आपसी समझ को आधार बनाकर ही दीर्घकालिक शांति संभव है।
दादागुरु चादर महोत्सव का शुभारंभ
इस अवसर पर RSS प्रमुख ने तीन दिनों के दादागुरु चादर महोत्सव का उद्घाटन किया। इस महोत्सव का उद्देश्य भारतीय संस्कृति, समरसता और सामाजिक समागम को बढ़ावा देना है। इस मौके पर विशेष सिक्के और डाक टिकट का विमोचन भी किया गया। भागवत ने कहा कि महोत्सव का आयोजन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह लोगों को आध्यात्मिक और सामाजिक एकता की याद दिलाने का माध्यम भी है। उनका मानना है कि एकजुटता के बिना समाज और राष्ट्र में स्थायित्व नहीं आता, और इसी भाव से उन्होंने युद्ध और कलह के पीछे की जड़ पर प्रकाश डाला।










