ग्रीनलैंड पर अमेरिका की सख्ती, NATO ने भारत से मदद मांगी, पीएम मोदी बने उम्मीद

ग्रीनलैंड पर अमेरिका की सख्ती, NATO ने भारत से मदद मांगी, पीएम मोदी बने उम्मीद

ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के सख्त रुख से NATO अपने सबसे बड़े आंतरिक संकट में फंस गया है। डेनमार्क सैन्य रूप से कमजोर नजर आ रहा है, जबकि यूरोपीय देश टकराव से बचने के लिए कूटनीतिक रास्ता तलाश रहे हैं।

World News: पिछले कुछ दिनों में नाटो (NATO) अपने 76 साल के इतिहास के सबसे बड़े और असहज संकट से गुजर रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस बार संकट की वजह कोई बाहरी दुश्मन देश नहीं, बल्कि खुद नाटो का सबसे ताकतवर सदस्य अमेरिका और उसके राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के आक्रामक रुख ने पूरे यूरोप की नींद उड़ा दी है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब नाटो और डेनमार्क की नजरें भारत की ओर टिकी हुई हैं।

क्यों अचानक भारत की तरफ देख रहा है NATO

आज की वैश्विक राजनीति संतुलन, रणनीति और भरोसे पर टिकी है। ऐसे में जब नाटो जैसा शक्तिशाली सैन्य संगठन खुद असमंजस में हो, तो यह साफ संकेत देता है कि हालात कितने गंभीर हैं। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की दादागिरी और सैन्य विकल्पों की खुली चर्चा ने डेनमार्क को सीधे खतरे में डाल दिया है। यही वजह है कि डेनमार्क और नाटो अब भारत से मदद की उम्मीद कर रहे हैं। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि भारत की बढ़ती global credibility और diplomatic strength का प्रमाण है।

ग्रीनलैंड पर ट्रंप का दबाव

डोनाल्ड ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड को लेकर बयान दे चुके हैं, लेकिन इस बार मामला ज्यादा गंभीर हो गया है। अमेरिका का तर्क है कि अगर उसने ग्रीनलैंड पर नियंत्रण नहीं किया, तो रूस या चीन वहां अपनी पकड़ मजबूत कर सकते हैं। अमेरिका किसी भी हाल में रूस या चीन को अपना पड़ोसी नहीं बनने देना चाहता। इसी सोच के तहत वाइट हाउस ने यह भी साफ किया है कि military option को पूरी तरह खारिज नहीं किया गया है। यही बयान यूरोप के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया है।

डेनमार्क कितना तैयार है मुकाबले के लिए

डेनमार्क ने ट्रंप की सैन्य धमकी को हल्के में नहीं लिया है। प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन की सरकार ने साफ कर दिया है कि अगर अमेरिकी सैनिक ग्रीनलैंड की जमीन पर उतरे, तो उन्हें पहले गोली और बाद में सवाल मिलेंगे। यह आदेश 1952 के एक सैन्य निर्देश पर आधारित है, जो आज भी लागू है। इसके तहत डेनिश सेना को बिना सरकार या कमांड की अनुमति के आक्रमणकारी पर जवाबी कार्रवाई की छूट है।

इसके अलावा, डेनमार्क ने ग्रीनलैंड को फिर से हथियारबंद करने के लिए 13.8 अरब डॉलर खर्च करने की घोषणा भी की है। हालांकि, ये तैयारियां अमेरिका जैसी सुपरपावर के सामने काफी सीमित मानी जा रही हैं।

डेनमार्क की सैन्य ताकत की हकीकत

अगर सैन्य आंकड़ों की बात करें, तो डेनमार्क की स्थिति कमजोर नजर आती है। नाटो के भीतर उसके पास सबसे कम सशस्त्र बल हैं। डेनमार्क के कुल सैन्यकर्मियों की संख्या करीब 17,300 है, जो अकेले भारत के coast guard से भी कम है।

डेनिश थलसेना में लगभग 8,000 सैनिक हैं, जो भारतीय सेना की एक infantry division से भी कम माने जाते हैं। शाही डेनिश नौसेना में करीब 3,500 कर्मी हैं, जो भारत के INS Vikrant और INS Vikramaditya पर तैनात संयुक्त क्रू के बराबर हैं। डेनमार्क के पास कोई पनडुब्बी नहीं है और वह केवल नौ फ्रिगेट संचालित करता है।

वायुसेना की बात करें तो डेनमार्क के पास लगभग 3,000 जवान और करीब 118 विमान हैं। इसमें 26 पुराने F-16 और 21 F-35 fighter jets शामिल हैं, जिनमें से कई अमेरिका से ही खरीदे गए हैं। तुलना करें तो अमेरिका ने वेनेजुएला ऑपरेशन के दौरान अकेले 150 से ज्यादा विमान तैनात कर दिए थे।

ग्रीनलैंड की दूरी भी एक बड़ी चुनौती

डेनमार्क की एक और बड़ी कमजोरी है दूरी। ग्रीनलैंड डेनमार्क की मुख्य भूमि से करीब 3,000 किलोमीटर दूर स्थित है। इतनी कम समय में सैनिकों और हथियारों की तैनाती डेनमार्क के लिए बेहद मुश्किल काम है। इसके उलट अमेरिका पहले से ही आर्कटिक क्षेत्र में मजबूत मौजूदगी रखता है।

क्या युद्ध की स्थिति में नाटो मदद करेगा

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका और डेनमार्क के बीच सैन्य टकराव हुआ, तो नाटो खुलकर अमेरिका के खिलाफ नहीं जाएगा। नाटो के पूर्व अधिकारी जेमी शी के अनुसार, ऐसी स्थिति में लड़ाई एक दिन में ही खत्म हो सकती है। अमेरिका की सैन्य ताकत इतनी ज्यादा है कि यूरोपीय देशों द्वारा भेजी गई सीमित सेनाएं भी टिक नहीं पाएंगी।

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