हाई कोर्ट का अहम फैसला, जातिसूचक शब्द न होने पर SC/ST केस रद

हाई कोर्ट का अहम फैसला, जातिसूचक शब्द न होने पर SC/ST केस रद

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के एक मामले में एससी-एसटी एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जातिसूचक शब्दों के साक्ष्य न होने पर कानून लागू नहीं हो सकता।

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने वाराणसी के कैंट थाना क्षेत्र के निवासी विवेक शर्मा और काजल राय के खिलाफ दर्ज एससी-एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि मामले में उपलब्ध साक्ष्य और शिकायतकर्ता के बयान से यह साबित नहीं होता कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया गया था। इसी आधार पर हाई कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(2)(5) के तहत दर्ज केस को निरस्त कर दिया। इस फैसले को झूठे मामलों के खिलाफ एक अहम न्यायिक संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।

न्यायमूर्ति सुभाष चन्द्र शर्मा की पीठ का फैसला

यह आदेश न्यायमूर्ति सुभाष चन्द्र शर्मा ने विवेक शर्मा और अन्य की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। कोर्ट ने कहा कि केवल आरोप लगाना पर्याप्त नहीं है। किसी भी कानून के तहत अपराध सिद्ध करने के लिए ठोस साक्ष्य जरूरी होते हैं। जब शिकायतकर्ता और गवाहों के बयानों में जातिसूचक शब्दों के प्रयोग का उल्लेख ही नहीं है, तो एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्यवाही नहीं चल सकती।

एससी-एसटी एक्ट की धाराएं क्यों रद हुईं

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि एससी-एसटी एक्ट (SC/ST Act) का उद्देश्य समाज के कमजोर वर्गों को सुरक्षा देना है, लेकिन इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने पाया कि न तो प्राथमिकी और न ही विवेचना के दौरान दर्ज बयानों में ऐसा कोई तथ्य सामने आया जिससे यह साबित हो कि आरोपितों ने शिकायतकर्ता के खिलाफ जातिसूचक अपशब्दों का प्रयोग किया हो। ऐसे में एससी-एसटी एक्ट की धाराएं लागू नहीं होतीं।

आईपीसी की धारा 389 पर कार्यवाही जारी

हालांकि, हाई कोर्ट ने यह भी साफ किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 389 के तहत दर्ज आरोपों पर कार्यवाही जारी रहेगी। कोर्ट ने निचली अदालत को निर्देश दिया है कि यदि याचिकाकर्ता बरी किए जाने की अर्जी दाखिल करते हैं, तो अदालत साक्ष्यों और कानून के आधार पर उस पर निर्णय करे। इसका मतलब यह है कि एससी-एसटी एक्ट से राहत मिली है, लेकिन बाकी आरोपों पर कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।

किराए के विवाद से जुड़ा है पूरा मामला

मामले की पृष्ठभूमि में किराए का पुराना विवाद सामने आया है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सत्येंद्र कुमार त्रिपाठी ने कोर्ट को बताया कि काजल राय, शिकायतकर्ता राजेश कुमार की किरायेदार थीं। दोनों पक्षों के बीच करीब 18 साल के किराए के बकाये को लेकर विवाद चल रहा था। इसी विवाद के कारण शिकायतकर्ता की ओर से कथित रूप से झूठे आरोप लगाकर केस दर्ज कराया गया।

धमकी और झूठे आरोप का दावा

शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया था कि विवेक शर्मा और काजल राय ने उन्हें धमकी दी कि यदि वह मकान खाली करने के लिए 50 हजार रुपये नहीं देंगे, तो उन्हें काजल राय के साथ दुष्कर्म के झूठे केस में फंसा दिया जाएगा। इस आरोप के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर लिया और आगे की जांच शुरू की।

बयानों में विरोधाभास पर कोर्ट की टिप्पणी

याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता ने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि शिकायतकर्ता राजेश कुमार और उनकी भाभी चंपा देवी ने विवेचना के दौरान दिए गए अपने बयानों में कहीं भी जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल का आरोप नहीं लगाया। उन्होंने केवल रुपये नहीं देने पर झूठे केस में फंसाने की धमकी की बात कही थी। कोर्ट ने इसे एक महत्वपूर्ण तथ्य मानते हुए कहा कि जब बयानों में जाति को लेकर कोई अपशब्द नहीं है, तो एससी-एसटी एक्ट का मामला नहीं बनता।

घटना के समय मौजूद नहीं थे आरोपी

कोर्ट के सामने यह दलील भी रखी गई कि काजल राय के मकान खाली करने के करीब दो महीने बाद धमकी देने की शिकायत की गई। उस समय कथित घटना स्थल पर न तो विवेक शर्मा मौजूद थे और न ही काजल राय। ऐसे में धमकी देने का आरोप भी संदेह के दायरे में आता है। हाई कोर्ट ने इन तथ्यों को गंभीरता से लेते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया आरोप निराधार प्रतीत होते हैं।

चार्जशीट दाखिल होने पर उठे सवाल

इसके बावजूद जांच अधिकारी और क्षेत्राधिकारी (CO) ने भारतीय दंड संहिता और एससी-एसटी एक्ट की धाराओं में चार्जशीट दाखिल कर दी थी। इसी चार्जशीट और पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद करने की मांग को लेकर याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद आंशिक राहत देते हुए एससी-एसटी एक्ट की कार्यवाही को खत्म कर दिया।

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