आज भी बड़ी संख्या में किसान ऐसी जमीन पर खेती कर रहे हैं, जिसकी जमाबंदी उनके बाप-दादा या पूर्वजों के नाम पर दर्ज है। कागजों में नाम अपडेट न होने की यही स्थिति अब किसानों के लिए गंभीर परेशानी बनती जा रही है। जमीन उनकी है, मेहनत वही कर रहे हैं, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में नाम न होने के कारण कई जरूरी काम अटक जाते हैं।
खासकर Bihar में यह समस्या आम है। दशकों पुरानी जमाबंदी आज तक दुरुस्त नहीं हो पाई है। इसका नतीजा यह है कि किसान न तो सरकारी योजनाओं का पूरा लाभ ले पा रहे हैं और न ही जमीन से जुड़ा कोई कानूनी या बैंकिंग काम आसानी से कर पा रहे हैं।
बाप-दादा के नाम की जमाबंदी से क्या दिक्कतें होती हैं
जमाबंदी अगर पूर्वजों के नाम हो तो सबसे पहले दिक्कत सरकारी योजनाओं में आती है। पीएम किसान सम्मान निधि, फसल बीमा, किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) और कृषि ऋण जैसी योजनाओं में जमीन का रिकॉर्ड सही होना जरूरी होता है। नाम न मिलने पर आवेदन अटक जाता है या रिजेक्ट हो जाता है।
इसके अलावा जमीन की बिक्री, नामांतरण, बंटवारा या लीज पर देने जैसे काम भी मुश्किल हो जाते हैं। कई बार इसी वजह से पारिवारिक विवाद खड़े हो जाते हैं, क्योंकि कागजों में यह साफ नहीं होता कि असली हकदार कौन है।
जमाबंदी दुरुस्त कराने की प्रक्रिया क्यों है लंबी
जमाबंदी सुधार या नामांतरण की प्रक्रिया सीधी नहीं है। किसान को सबसे पहले यह साबित करना पड़ता है कि वह जमीन का कानूनी उत्तराधिकारी है। इसके लिए वंशावली, पूर्वजों का मृत्यु प्रमाण पत्र, खतियान, लगान रसीद, आधार और अन्य दस्तावेज जमा करने होते हैं।
आवेदन अंचल कार्यालय में दिया जाता है, जहां से जांच शुरू होती है। आपत्ति आमंत्रित की जाती है और कई मामलों में स्थल जांच भी होती है। अगर किसी रिश्तेदार ने आपत्ति दर्ज कर दी, तो मामला और लंबा खिंच जाता है। यही वजह है कि कई किसानों के आवेदन महीनों या सालों तक लंबित रहते हैं।
किसान अब क्या कदम उठाएं
विशेषज्ञों के अनुसार, किसानों को सबसे पहले अपने सभी दस्तावेज पूरे और सही रखने चाहिए। वंशावली में किसी तरह की गलती न हो, इसका विशेष ध्यान रखना जरूरी है। अगर जमीन का पारिवारिक बंटवारा नहीं हुआ है, तो आपसी सहमति से बंटवारा कराना प्रक्रिया को आसान बना सकता है।
जहां मामला ज्यादा उलझा हो या विवाद की आशंका हो, वहां कानूनी सलाह लेना भी फायदेमंद साबित हो सकता है। सही मार्गदर्शन के बिना किए गए आवेदन अक्सर छोटी-छोटी त्रुटियों के कारण खारिज या लंबित हो जाते हैं।
सरकारी कोशिशें, लेकिन परेशानी कायम
सरकार जमीन रिकॉर्ड को डिजिटल करने और नामांतरण प्रक्रिया को ऑनलाइन बनाने की दिशा में काम कर रही है। इससे पारदर्शिता जरूर बढ़ी है, लेकिन पुराने रिकॉर्ड, अधूरी जानकारी और पारिवारिक विवादों के कारण जमीनी स्तर पर किसानों की दिक्कतें अब भी बनी हुई हैं।
बाप-दादा के नाम पर जमीन की जमाबंदी आज किसानों के लिए केवल कागजी समस्या नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन चुकी है। सही जानकारी, पूरे दस्तावेज और धैर्य के साथ ही इस लंबी प्रक्रिया को पूरा किया जा सकता है। जब तक जमाबंदी दुरुस्त नहीं होती, तब तक किसान अपने अधिकारों और सरकारी लाभों से पूरी तरह जुड़ नहीं पाता। ऐसे में समय रहते कार्रवाई और जागरूकता ही इस समस्या से निकलने का सबसे बेहतर रास्ता है












