लोकसभा में ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा, मनीष तिवारी ने संसद के कामकाज और विपक्ष के अधिकारों का उठाया मुद्दा

लोकसभा में ओम बिरला के खिलाफ प्रस्ताव पर चर्चा, मनीष तिवारी ने संसद के कामकाज और विपक्ष के अधिकारों का उठाया मुद्दा

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि लोकतंत्र में सरकार के साथ विपक्ष को भी अपनी बात रखने का पूरा अधिकार मिलना चाहिए।

New Delhi: लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को पद से हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने सदन में अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि यह प्रस्ताव किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ नहीं है बल्कि संसद की कार्यप्रणाली और लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करने की कोशिश है।

तिवारी ने बताया कि लोकतंत्र में सरकार के पास अपना रास्ता होता है, लेकिन विपक्ष को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार होना चाहिए। उनका कहना था कि लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सभी पक्षों को समान अवसर और आवाज़ मिले।

लोकतंत्र में विपक्ष का अधिकार

चर्चा में मनीष तिवारी ने कहा, "इन ए डेमोक्रेसी द गवर्मेंट हैज इट्स वे बट द ऑपिजिशन मस्ट हैव इट्स से।" यानी लोकतंत्र में सरकार का अपना रास्ता होता है, लेकिन विपक्ष को अपनी बात कहने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि यही विपक्ष द्वारा स्पीकर के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का सार है।

उन्होंने जोर देकर कहा कि विपक्ष का उद्देश्य सदन की गरिमा को बनाए रखना और संसद को सुचारू रूप से चलाना है। उनका कहना था कि लोकतंत्र तभी स्वस्थ रहता है जब सदन की कार्यप्रणाली प्रभावी और पारदर्शी हो।

संसद के कामकाज में गिरावट पर चिंता

कांग्रेस सांसद ने संसद के कामकाज में गिरावट पर चिंता जताई। उन्होंने बताया कि 1952 से 1957 तक चली पहली लोकसभा 135 दिन तक चली थी, जबकि हाल की 17वीं लोकसभा केवल 55 दिन ही चली। यह आंकड़ा बताता है कि आज संसद पहले जैसी प्रभावी रूप से नहीं चल रही है।

तिवारी ने कहा कि विपक्ष की पीड़ा यही है कि सदन सुचारू और पारदर्शी तरीके से नहीं चल पा रहा है। उन्होंने इसे लोकतंत्र के लिए चुनौती बताया और कहा कि सदन को संवैधानिक ढंग से चलाना आवश्यक है।

माइक बंद करने की घटनाओं पर सवाल

कांग्रेस सांसद ने विपक्षी सदस्यों के साथ हो रहे व्यवहार पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि कई बार जब कोई सांसद सरकार की आलोचना करता है या कड़ी प्रतिक्रिया देता है तो उसका माइक बंद कर दिया जाता है। यह व्यवहार लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ है।

राहुल गांधी के उदाहरण का हवाला

मनीष तिवारी ने कहा कि राष्ट्रपति के धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी एक प्रकाशित मैगजीन के लेख का हवाला देना चाहते थे, लेकिन उन्हें ऐसा करने की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने बताया कि जो सामग्री सार्वजनिक रूप से प्रकाशित हो चुकी है और सार्वजनिक डोमेन में मौजूद है, उसे पढ़ने से रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

तिवारी ने इसे नेता प्रतिपक्ष की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध बताया। उनका कहना था कि संसद में सभी सांसदों को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए।

संसद की पुरानी परंपराओं को याद किया

मनीष तिवारी ने संसद की पुरानी परंपराओं को याद करते हुए बताया कि पहले विपक्ष के नेताओं को पर्याप्त सम्मान और अवसर दिया जाता था। उन्होंने अपने संसदीय अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि वह 15वीं लोकसभा के सदस्य रहे हैं और उस समय नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज को बोलने से रोका नहीं जाता था।

कई बार सुषमा स्वराज अपनी सीट से इशारा करती थीं तो उनका माइक ऑन हो जाता था। उन्होंने कहा कि यह संसदीय परंपरा लोकतंत्र और सदन की गरिमा को बनाए रखने का हिस्सा थी।

लालकृष्ण आडवाणी के उदाहरण का जिक्र

तिवारी ने वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के उदाहरण का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि काम रोको प्रस्ताव के दौरान जब आडवाणी जी बहस शुरू करते थे, तो सांसद पूरी बहस ध्यान से सुनते थे। यह पारंपरिक संसदीय शिष्टाचार का हिस्सा था। मनीष तिवारी ने कहा कि यह व्यवहार सदन की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की पहचान है।

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