संत प्रेमानंद महाराज ने स्पष्ट किया कि सात जन्मों तक एक ही पति या पत्नी मिलना केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कर्म, प्रारब्ध और भगवान की कृपा पर निर्भर करता है। भक्ति और तपस्या के बिना यह स्वाभाविक नियम नहीं है। उनके अनुसार गहरी भक्ति जीवनसाथी के पुनर्मिलन और संबंधों की निरंतरता में निर्णायक होती है।
Premanand Maharaj Spiritual Insight: सात जन्मों तक एक ही जीवनसाथी का रहना: संत प्रेमानंद महाराज ने एक वायरल वीडियो में बताया कि पति-पत्नी का संबंध केवल भावनाओं पर आधारित नहीं होता, बल्कि कर्म, प्रारब्ध और ईश्वर की विशेष कृपा पर निर्भर करता है। महाराज के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति गहन भक्ति और तपस्या करता है, तो भगवान चाहें तो सात जन्मों तक एक ही जीवनसाथी का वरदान दे सकते हैं। उन्होंने एक कथा के माध्यम से यह समझाया कि सांसारिक प्रेम से अधिक भक्ति निर्णायक भूमिका निभाती है।
कर्म और प्रारब्ध से तय होता है संबंध
प्रेमानंद महाराज के अनुसार, पति-पत्नी का संबंध केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कर्म और प्रारब्ध से तय होता है। हर जन्म में जीव के कर्म बदलते हैं और उसी के अनुसार संबंधों का स्वरूप भी बदल जाता है। इसलिए यह आवश्यक नहीं कि इस जन्म का जीवनसाथी अगले जन्म में भी उसी रूप में मिले।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह भी तय नहीं होता कि अगला जन्म मनुष्य योनि में ही मिले। कर्मों के अनुसार जीव किसी भी योनि में जा सकता है, जिससे पुराने रिश्तों का स्वरूप बदल जाता है। इसी कारण केवल इच्छा या भाव के आधार पर सात जन्मों तक एक ही पति या पत्नी मिलना स्वाभाविक नियम नहीं है।

भगवान की कृपा से ही बनता है विशेष संयोग
हालांकि प्रेमानंद महाराज यह भी कहते हैं कि ईश्वर की कृपा से असंभव भी संभव हो सकता है। यदि कोई स्त्री या पुरुष अनन्य भक्ति, पूर्ण समर्पण और तप के साथ भगवान से यह वर मांगे कि वही जीवनसाथी कई जन्मों तक साथ रहे, तो भगवान ऐसा विधान रच सकते हैं।
उनका कहना है कि सृष्टि के नियम भगवान के अधीन हैं। जब भक्ति जीवन का केंद्र बन जाती है, तब भगवान अपने नियमों में विशेष कृपा कर सकते हैं। लेकिन यह साधारण कर्मों से नहीं, बल्कि गहरी भक्ति और तपस्या से ही संभव है।
कथा से समझाया भक्ति का महत्व
अपनी बात को समझाने के लिए प्रेमानंद महाराज ने एक मार्मिक कथा सुनाई। एक जन्म में पति-पत्नी का गहरा प्रेम था, लेकिन पति ने भक्ति मार्ग नहीं अपनाया। मृत्यु के बाद पत्नी अपनी भक्ति के कारण अगले जन्म में राजकुमारी बनी, जबकि पति आसक्ति के कारण हाथी की योनि में चला गया।
बाद में पत्नी की तपस्या और भगवान की कृपा से पति को उस योनि से मुक्ति मिली और पुनर्मिलन संभव हुआ। इस कथा के जरिए महाराज ने बताया कि केवल सांसारिक प्रेम नहीं, बल्कि भक्ति ही अंतिम निर्णायक होती है।












