मुंबई BMC चुनावों में 43 नेताओं ने अपने परिवार के सदस्यों को टिकट दिए। बीजेपी, कांग्रेस और शिवसेना में पारिवारिक उम्मीदवारों की संख्या बढ़ी। राजनीतिक वंशवाद और ‘परिवार पहले’ की नीति अब चुनावी बहस का केंद्र बनी है।
BMC Election: मुंबई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) चुनावी पटल पर इस बार एक नया राजनीतिक रुझान उभरकर सामने आया है। 15 जनवरी को होने वाले BMC चुनावों के लिए नामांकन प्रक्रिया बंद होने के बाद स्पष्ट हो गया कि कम से कम 43 नेताओं ने अपने परिवार के सदस्यों को टिकट दिलाया है। इस तरह का पैटर्न राजनीतिक वंशवाद और पारिवारिक राजनीति को लेकर चर्चा का मुख्य विषय बन गया है।
43 नेताओं ने परिवार के लिए सुरक्षित किए टिकट
इस बार के BMC चुनावों में कम से कम 43 नेताओं ने अपने करीबी रिश्तेदारों जैसे पत्नियों, भाइयों, बहनों, बेटों और बहुओं को टिकट दिए हैं। इस कदम से यह संकेत मिलता है कि स्थानीय राजनीति में पारिवारिक रिश्तों का प्रभाव काफी बढ़ गया है।
प्रमुख नेताओं के परिवारों की उम्मीदवारी
बीजेपी और कांग्रेस सहित विभिन्न पार्टियों ने अपने नेताओं के परिवार के सदस्यों को टिकट दिए हैं। बीजेपी के विधायक राहुल नार्वेकर ने अपने परिवार के तीन सदस्यों को वार्ड 226 और 227 से टिकट दिया। कांग्रेस के विधायक असलम शेख ने भी तीन टिकट अपने परिवार के लिए सुरक्षित किए हैं। पूर्व एनसीपी विधायक नवाब मलिक के परिवार को भी तीन टिकट मिले हैं।
शिवसेना शिंदे गुट के टिकट
शिवसेना शिंदे गुट ने भी ‘परिवार पहले’ की रणनीति अपनाई। सांसद रविंद्र वाइकार की बेटी दीप्ति वाइकार वार्ड 73 (आंधेरी ईस्ट) से चुनाव लड़ रही हैं। विधायक दिलीप लांडे की पत्नी शैला लांडे को वार्ड 163 से टिकट मिला है। अशोक पाटिल के बेटे रुपेश पाटिल वार्ड 113 से चुनावी मैदान में हैं। सदा सरवणकर के बेटे समाधान और बेटी प्रिया को क्रमशः वार्ड 194 और 191 से टिकट मिला है।
बीजेपी के परिवारिक उम्मीदवार
बीजेपी में राहुल नार्वेकर के परिवार से जुड़े तीन टिकट हैं। मकरंद नार्वेकर (भाई) वार्ड 226 से चुनाव लड़ रहे हैं। हार्षिता नार्वेकर (भाभी/भाई की पत्नी) और डॉ. गौरवी शिवालकर (कजिन/चचेरी बहन) को वार्ड 227 से टिकट दिया गया है। नील सोमैया, जो पूर्व सांसद किरिट सोमैया के बेटे हैं, मलुंड वार्ड 107 से चुनाव जीत चुके हैं। पार्टी के अन्य नेताओं में प्रवीण दरेकर के भाई प्रकाश दरेकर को वार्ड 3 से और मुंबई प्रदेश अध्यक्ष अमित साटम के साले को वार्ड 68 से उम्मीदवारी दी गई है।
कांग्रेस में परिवार की पैठ

कांग्रेस ने भी कई परिवार के सदस्यों को टिकट दिया है। असलम शेख के बेटे हैदर शेख को वार्ड 34 से टिकट मिला है। उनकी बहन क़मर जहान सिद्दीकी को वार्ड 33 से और दामाद सैफ़ अहमद खान को आंधेरी वेस्ट से टिकट मिला है। आरीफ नसीम खान के बेटे आमिर खान वार्ड 162 (कुर्ला) से चुनाव लड़ रहे हैं। मोसिन हादिर के बेटे सुफ़ियान हादिर को वार्ड 65 और पत्नी मेहेर हादिर को वार्ड 66 से टिकट मिला है। इसके अलावा चंद्रकांत हंडोरे की बेटी प्रज्योति वार्ड 140 से चुनावी मैदान में हैं।
शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट
शिवसेना उद्धव ठाकरे गुट में मौजूदा विधायक संजय दिना पाटील की बेटी राजूल वार्ड 114 से उम्मीदवार हैं। सुनील प्रभु के बेटे अंकित को वार्ड 54 से और विधायक मनोज जमसुतकर की पत्नी सोनम को वार्ड 210 से टिकट मिला है।
बीजेपी का विरोधाभासी रुख
बीजेपी ने खुद को पारंपरिक वंशवाद विरोधी पार्टी के रूप में पेश किया है। लेकिन इस बार कई मामलों में उसने अपने नीतिगत रुख को तोड़ा। राहुल नार्वेकर के परिवार को टिकट देने की अनुमति दी गई, लेकिन कुछ नेताओं के रिश्तेदारों को टिकट नहीं मिला। इसमें मंत्री आशीष शेलार के भाई विनोद शेलार, विधायक मनीषा चौधरी की बेटी अंकिता और MLC राजहंस सिंह के बेटे नितेश शामिल हैं।
राजनीतिक वंशवाद का सवाल
इस चुनावी पद्धति ने मुंबई की स्थानीय राजनीति में राजनीतिक वंशवाद (dynasty politics) के महत्व पर सवाल खड़ा कर दिया है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि परिवार पहले की नीति पार्टी कार्यकर्ताओं और अनुभवी नेताओं की जगह पारिवारिक रिश्तों को प्राथमिकता देने का संकेत देती है।
पारिवारिक राजनीति की रणनीति
अधिकतर नेताओं ने अपने प्रभाव और परिचित वोटबैंक की ताकत के बल पर अपने परिवार को टिकट दिलाया। कई मामलों में पार्टी कार्यकर्ताओं का अनुभव या वरिष्ठता कम होने के बावजूद परिवारिक उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी गई। यह रणनीति परिवार और वंश की राजनीति को और मजबूत करती दिख रही है।
हालांकि परिवार से जुड़े उम्मीदवारों को टिकट मिला है, लेकिन उन्हें चुनावी मैदान में जनता का समर्थन पाने के लिए मेहनत करनी होगी। पारंपरिक वोटबैंक और व्यक्तिगत छवि का प्रभाव ही उनके जीतने की संभावना तय करेगा।
चुनावी समीकरणों में बदलाव
‘परिवार पहले’ की राजनीति से BMC चुनाव के समीकरण बदल सकते हैं। पारिवारिक उम्मीदवारों की संख्या बढ़ने से नए गठबंधन और वोटिंग पैटर्न प्रभावित हो सकते हैं। इससे स्थानीय राजनीति में पारिवारिक नेटवर्क और वंशवाद की भूमिका और अधिक स्पष्ट हो गई है।










