'चमकवन' नाम के घने जंगल में, एक बहुत ही पुराना और समझदार उल्लू रहता था, जिसका नाम था 'प्रोफ़ेसर हूट'। प्रोफ़ेसर हूट को दुनिया भर की बातें पता थीं, लेकिन उन्हें एक बात का बहुत अफ़सोस था। जंगल का स्कूल सिर्फ़ दिन में खुलता था। बेचारे रात में जागने वाले जानवर, जैसे चमगादड़, जुगनू और जंगली चूहे, कभी स्कूल नहीं जा पाते थे और अनपढ़ रह जाते थे।
कहानी
एक रात, प्रोफ़ेसर हूट अपनी बरगद की डाल पर बैठे सोच रहे थे, 'यह तो नाइंसाफी है! पढ़ाई पर सबका हक़ है, चाहे वह दिन में जागे या रात में।'
तभी उनके दिमाग़ में एक बत्ती जली। उन्होंने अपनी बड़ी-बड़ी गोल आँखें घुमाईं और बोले, 'हू-हू! आईडिया! मैं जंगल में रात का स्कूल खोलूँगा, और वह भी बिल्कुल नए ज़माने का... ऑनलाइन स्कूल!'
लेकिन जंगल में इंटरनेट और कंप्यूटर कहाँ से आएगा? प्रोफ़ेसर हूट बहुत जुगाड़ू थे।
उन्होंने तुरंत काम शुरू कर दिया।
स्क्रीन (Screen): उन्होंने जंगल से ढेर सारे 'चमकने वाले मशरूम' (Glowing Mushrooms) इकट्ठे किए और उन्हें एक बड़ी, सपाट चट्टान पर सजा दिया। अंधेरे में वे मशरूम कंप्यूटर की स्क्रीन की तरह जगमगा रहे थे।
माउस (Mouse): एक असली, छोटा सा शरारती 'चीकू चूहा' माउस बनने के लिए तैयार हो गया। वह स्क्रीन के पास बैठकर इधर-उधर फुदकता और प्रोफ़ेसर के इशारे पर चीज़ों को छूता।
नेटवर्क (Network): मकड़ी मौसी ने रातों-रात अपनी मज़बूत रेशमी डोरियों से पेड़ों के बीच 'वेब' (जाला) बुन दिया, जो तारों का काम कर रहा था।
वाई-फाई सिग्नल (Wi-Fi Signal): सैकड़ों जुगनू अपनी रोशनी जलाकर-बुझाकर सिग्नल देने के लिए तैयार थे।
अगली रात, 'ऑनलाइन क्लास' का उद्घाटन हुआ।
प्रोफ़ेसर हूट ने अपनी पत्तियों से बनी टाई ठीक की और अपनी 'स्क्रीन' के सामने बैठ गए। 'नमस्कार विद्यार्थियों! मेरी ऑनलाइन क्लास में आपका स्वागत है,' उनकी भारी आवाज़ गूंजी।
विद्यार्थी भी तैयार थे। 'चम्पी चमगादड़' एक डाल से उल्टा लटककर क्लास ले रहा था। 'जुगनूओं की टोली' एक झाड़ी पर बैठकर जगमगा रही थी। और 'खरगोशों का परिवार' भी अपनी नींद खराब करके, आँखें मलते हुए क्लास में शामिल हुआ था।
आज का विषय था 'खगोल विज्ञान' (Astronomy) यानी तारों और ग्रहों की पढ़ाई।
प्रोफ़ेसर हूट ने एक लंबी छड़ी से आसमान की तरफ़ इशारा किया और बोले, 'देखो बच्चों! वह हमारी सबसे बड़ी स्क्रीन है, आसमान! और वह देखो, सात तारों का समूह, उसे 'सप्तर्षि' कहते हैं।'
चीकू चूहा जल्दी से चट्टान पर कूदा और एक चमकते पत्थर को उस तारे की सीध में रख दिया, जैसे कंप्यूटर पर कर्सर (Cursor) चलता है।
सब जानवर बड़े ध्यान से सुन रहे थे। चम्पी चमगादड़ ने बीच में पूछा, 'सर! क्या चाँद भी वाई-फाई से चलता है? कभी पूरा सिग्नल आता है, कभी आधा!' प्रोफ़ेसर हूट हँस पड़े और बोले, 'नहीं चम्पी, यह तो उसकी कलाएँ हैं।'
क्लास बहुत मज़ेदार चल रही थी, कि तभी एक गड़बड़ हो गई। 'भोलू भालू', जिसे दिन में सोना चाहिए था, क्लास का शोर सुनकर वहाँ आ गया। उसे लगा कि कोई फिल्म चल रही है। वह धम्म से सबसे आगे बैठ गया और दो मिनट में ही ज़ोर-ज़ोर से खर्राटे लेने लगा 'ख़र्रर्र... फुर्रर्र...'
उसकी तेज़ हवा से चीकू 'माउस' उड़कर दूर जा गिरा और जुगनूओं का नेटवर्क बिखर गया। क्लास में 'बफरिंग' (Buffering) शुरू हो गई!
सब जानवर हँसने लगे। प्रोफ़ेसर हूट ने अपनी चोंच से भोलू को जगाया और कहा, 'भोलू भाई, यह सोने की नहीं, जागने की क्लास है!' भोलू शर्माकर वहाँ से खिसक गया।
थोड़ी देर में नेटवर्क ठीक हुआ और क्लास फिर शुरू हुई। उस रात जंगल के जानवरों ने पहली बार तारों की दुनिया को समझा।
सुबह होते ही क्लास ख़त्म हुई। सब जानवर बहुत खुश थे। प्रोफ़ेसर हूट की 'जुगाड़ू ऑनलाइन क्लास' सुपरहिट हो गई थी। अब जंगल में कोई भी अनपढ़ नहीं रहने वाला था, चाहे दिन हो या रात।
सीख
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि 'अगर हमारे अंदर कुछ करने का जज़्बा हो, तो साधनों की कमी कभी रुकावट नहीं बनती। शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करने का कोई एक समय या तरीका नहीं होता। प्रोफ़ेसर हूट ने अपनी सूझ-बूझ से यह साबित कर दिया कि जहाँ चाह, वहाँ राह।'













