विपक्षी दलों के उपराष्ट्रपति उम्मीदवार सुदर्शन रेड्डी ने कहा है कि लोकतंत्र को केवल सरकारों से ही खतरा नहीं है, बल्कि धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर नागरिकों से भी खतरा हो सकता है।
नई दिल्ली: भारत में उपराष्ट्रपति चुनाव को लेकर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। इस बार विपक्ष की ओर से उम्मीदवार बनाए गए पूर्व जज सुदर्शन रेड्डी ने अपने विजन और विचारों को स्पष्ट करते हुए कहा कि उनका मकसद किसी राजनीतिक पार्टी के लिए नहीं, बल्कि संविधान की रक्षा के लिए लड़ना है। उन्होंने समाज में बढ़ते ध्रुवीकरण, लोकतंत्र के सामने चुनौतियों, और सुरक्षा बलों की भूमिका जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखी।
सुदर्शन रेड्डी का कहना है कि आज का माहौल काफी बदल गया
सुदर्शन रेड्डी का कहना है कि आज का माहौल काफी बदल गया है। समाज में तेजी से ध्रुवीकरण हो रहा है, जो लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। उन्होंने कहा:
'लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा सिर्फ सरकारों से नहीं होता। खतरा नागरिकों से भी होता है, जब वे धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के आधार पर समाज को बांटने की कोशिश करते हैं।'
उनका मानना है कि अगर नागरिक खुद समाज को विभाजित करेंगे, तो लोकतंत्र की नींव कमजोर हो जाएगी।
सुदर्शन रेड्डी ने एनडीए के नंबर गेम और गुप्त मतदान पर दी राय
एनडीए के पास पहले से ही बहुमत होने की बातों पर रेड्डी ने कहा कि यह चुनाव गुप्त मतदान से होता है और इसमें किसी पार्टी का व्हिप लागू नहीं होता। यहां कोई पार्टी अपने सांसद को मजबूर नहीं कर सकती। आखिरकार वोट सांसद ही करते हैं और किसी को यह नहीं पता चलता कि किसने किसे वोट दिया। मैं आशावादी हूं और सभी सांसदों को पत्र लिखकर अपील करूंगा कि वे मेरी उम्मीदवारी को योग्यता के आधार पर देखें।
जब उनसे गृह मंत्री अमित शाह की आलोचना के बारे में पूछा गया, तो रेड्डी ने कहा कि कुछ लोग गलत जानकारी फैला रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया: अगर किसी ने सलवा जुडूम का फैसला पढ़ा होता, तो ऐसी बातें नहीं करते। मैंने सिर्फ इतना कहा था कि हिंसा से लड़ने का अधिकार सिर्फ राज्य के पास है, न कि किसी मिलिशिया या समूह के पास। सरकार को निर्दोष आदिवासियों को इसमें शामिल नहीं करना चाहिए और नागरिकों के अधिकारों व स्वतंत्रताओं की रक्षा करना उसका कर्तव्य है।
स्कूल भवनों में सुरक्षा बलों की तैनाती का मुद्दा
शाह ने स्कूल और कॉलेज की इमारतों से सुरक्षा बलों को हटाने के रेड्डी के फैसले की आलोचना की थी। इस पर रेड्डी ने पलटवार करते हुए कहा: क्या यह मान लिया जाए कि सरकार सुरक्षा बलों के लिए रहने की व्यवस्था नहीं कर सकी, इसलिए स्कूल और कॉलेज की इमारतों पर कब्जा कर लिया गया? मैंने सिर्फ इतना कहा था कि स्कूलों को चलने दें। संविधान के हिसाब से अगर कोई जज फैसला देता है तो उसे पक्षपाती कैसे कहा जा सकता है?
कुछ पूर्व जजों ने रेड्डी का समर्थन किया है, तो कुछ ने विरोध भी किया। इस पर उन्होंने कहा कि यह स्वाभाविक है, क्योंकि हर मुद्दे पर अलग-अलग राय होती है। मैं उन 56 साथियों का आभार प्रकट करता हूं जिन्होंने मेरा समर्थन किया। यह सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं है, बल्कि एक संवैधानिक पद की गरिमा का सवाल है।
रेड्डी ने भारतीय संविधान के मूल ढांचे और मौलिक अधिकारों की रक्षा पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुब्बा राव के गोलकनाथ निर्णय ने यह सिद्धांत दिया कि संसद मौलिक अधिकारों को खत्म नहीं कर सकती। बाद में केशवानंद भारती केस ने स्पष्ट किया कि संविधान के मूल ढांचे को बदला नहीं जा सकता।