नए न्यायिक आदेशों के बाद स्पष्ट हो गया है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएँ अपने पूर्व पति से गुजाराभत्ता मांग सकती हैं। चाहे तलाक हो चुका हो, अगर पति ने महिला की भविष्य की देखभाल के लिए “उचित प्रावधान” नहीं किया है, तो वह राहत पाने की कानूनी हकदार है।
अदालतों ने कहा है कि गुजाराभत्ता देना दान या उपकार नहीं बल्कि पति की जिम्मेदारी है। इससे यह तय हुआ कि व्यक्तिगत धार्मिक कानून या तलाक की प्रकृति इसके दायित्व को समाप्त नहीं करती।
न्याय व्यवस्था अब यह मानती है कि तलाक के बाद भी महिला को आर्थिक सुरक्षा का अधिकार है। यदि वह खुद अपनी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रही हो, तो पूर्व पति पर गुजाराभत्ता देने का दायित्व बना रहेगा।
इस फैसला से तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के आर्थिक अधिकारों को मजबूती मिली है। अब उन्हें दिवालियापन, निर्भरता या सामाजिक असुरक्षा का सामना नहीं करना पड़ेगा — अदालत उनके साथ है।










