Tata Steel पर यूरोप में बड़ा झटका, नीदरलैंड्स में 1.4 अरब यूरो का पर्यावरणीय मुकदमा दर्ज

Tata Steel पर यूरोप में बड़ा झटका, नीदरलैंड्स में 1.4 अरब यूरो का पर्यावरणीय मुकदमा दर्ज

नीदरलैंड्स में Tata Steel के खिलाफ 1.4 अरब यूरो का पर्यावरणीय मुकदमा दायर हुआ है। कंपनी पर जहरीले उत्सर्जन से पर्यावरण और स्थानीय लोगों की सेहत को नुकसान पहुंचाने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं।

Tata Steel: टाटा स्टील की यूरोपीय यूनिट एक बार फिर विवादों के घेरे में आ गई है। नीदरलैंड्स में कंपनी के खिलाफ करीब 1.4 अरब यूरो यानी लगभग 1.6 अरब डॉलर के मुआवजे का मुकदमा दायर किया गया है। आरोप है कि टाटा स्टील की फैक्टरी से निकलने वाले जहरीले उत्सर्जन ने आसपास के पर्यावरण को गंभीर नुकसान पहुंचाया है और स्थानीय लोगों की सेहत पर भी नकारात्मक असर डाला है। यह मामला न केवल कंपनी की छवि के लिए चुनौती है, बल्कि यूरोप में उसके भविष्य की रणनीति पर भी असर डाल सकता है।

किसने और कहां दायर किया मुकदमा

यह मुकदमा नीदरलैंड्स की एक गैर-सरकारी संस्था Stichting Frisse Wind.nu की ओर से दायर किया गया है। संगठन ने वेलसेन-नूर्ड गांव के पास स्थित टाटा स्टील की फैक्टरी को इस विवाद का केंद्र बनाया है। NGO का दावा है कि फैक्टरी से निकलने वाली जहरीली गैसों और अन्य प्रदूषकों के कारण इलाके में रहने वाले लोगों को गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। साथ ही, इस प्रदूषण की वजह से स्थानीय निवासियों की संपत्ति की कीमतों में भी गिरावट आई है।

संगठन ने हार्लेम स्थित District Court North Holland में इस मामले से जुड़ी कानूनी कागजी कार्रवाई पूरी कर दी है। टाटा स्टील ने भी आधिकारिक तौर पर इस मुकदमे की पुष्टि की है और कहा है कि कंपनी सभी दस्तावेजों की समीक्षा कर रही है।

पर्यावरण और सेहत को लेकर गंभीर आरोप

NGO की ओर से लगाए गए आरोपों के मुताबिक, टाटा स्टील की फैक्टरी से निकलने वाले उत्सर्जन में खतरनाक रसायन शामिल हैं, जो हवा, मिट्टी और पानी को दूषित कर रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि लंबे समय से प्रदूषण के कारण सांस की बीमारियां, त्वचा संबंधी समस्याएं और अन्य स्वास्थ्य जोखिम बढ़ गए हैं।

संगठन का यह भी दावा है कि फैक्टरी के आसपास रहने वाले परिवारों को लगातार डर के साए में रहना पड़ रहा है। उनका मानना है कि प्रदूषण के चलते इलाके की रहने लायक स्थिति कमजोर हुई है, जिससे घरों और जमीन की कीमतों पर सीधा असर पड़ा है। इसी नुकसान की भरपाई के लिए NGO ने भारी मुआवजे की मांग की है।

टाटा स्टील की यूरोपीय यूनिट पर बढ़ता दबाव

यह मुकदमा कोई अलग-थलग घटना नहीं है। बीते कुछ वर्षों से टाटा स्टील की यूरोपीय यूनिट्स पर पर्यावरणीय नियमों को लेकर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। 2024 में नीदरलैंड्स के नियामकों ने कंपनी को सख्त चेतावनी दी थी। उस समय कहा गया था कि अगर IJmuiden पोर्ट सिटी में स्थित कोक प्लांट से निकलने वाली जहरीली गैसों में कमी नहीं लाई गई, तो कंपनी पर करीब 27 मिलियन यूरो का जुर्माना लगाया जा सकता है और प्लांट को बंद भी किया जा सकता है।

इस चेतावनी ने यह साफ कर दिया था कि डच सरकार और नियामक एजेंसियां पर्यावरण को लेकर किसी भी तरह की ढिलाई बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं। मौजूदा मुकदमा उसी सख्ती का अगला कदम माना जा रहा है।

पहले भी हो चुकी है जांच

टाटा स्टील के खिलाफ पर्यावरणीय आरोप नए नहीं हैं। साल 2022 में डच अभियोजकों ने कंपनी और उसके एक पार्टनर के खिलाफ जांच शुरू की थी। उस जांच का उद्देश्य यह पता लगाना था कि क्या कंपनी ने जानबूझकर मिट्टी, हवा और पानी को खतरनाक पदार्थों से प्रदूषित किया।

उस समय भी यह मामला काफी चर्चा में रहा था और यूरोप में टाटा स्टील की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हुए थे। हालांकि, कंपनी ने तब भी सभी आरोपों से इनकार किया था और कहा था कि वह स्थानीय नियमों और मानकों का पालन कर रही है।

क्या है टाटा स्टील का पक्ष

टाटा स्टील का कहना है कि वह इस मुकदमे से जुड़े सभी दस्तावेजों की बारीकी से जांच कर रही है। कंपनी के अनुसार, उसके पास अपने बचाव के लिए मजबूत तर्क और तथ्य मौजूद हैं। टाटा स्टील ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह पर्यावरणीय जिम्मेदारी को गंभीरता से लेती है और उत्सर्जन कम करने के लिए लगातार निवेश कर रही है।

कंपनी ने बताया कि यह मामला सामूहिक मुकदमे यानी Class Action के नियमों के तहत चलेगा। इसमें दो चरण होंगे और हर चरण में करीब दो से तीन साल का समय लग सकता है। यानी यह कानूनी लड़ाई लंबी चलने वाली है।

ग्रीन प्लान पर पहले ही किया जा चुका है ऐलान

गौर करने वाली बात यह है कि टाटा स्टील ने हाल ही में नीदरलैंड्स में उत्सर्जन कम करने के लिए एक बड़ी योजना की घोषणा की थी। सितंबर में कंपनी ने बताया था कि वह करीब 6.5 अरब यूरो तक की लागत से एक ग्रीन ट्रांजिशन प्लान पर काम कर रही है। इस योजना के तहत कार्बन उत्सर्जन घटाने, साफ तकनीक अपनाने और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादन पर जोर दिया जाएगा।

इस ग्रीन प्लान में डच सरकार भी भागीदार है और उसने करीब 2 अरब यूरो तक का योगदान देने की बात कही है। इससे साफ है कि कंपनी और सरकार दोनों ही इस बात को मानते हैं कि पर्यावरणीय सुधार जरूरी है।

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