शेर की खाल में गधा: दिखावे की सच्चाई बताने वाली प्रेरक कहानी

शेर की खाल में गधा: दिखावे की सच्चाई बताने वाली प्रेरक कहानी
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दिखावा और झूठ की बुनियाद पर खड़ी इज्जत कभी स्थायी नहीं होती। कई बार लोग खुद को महान और ताकतवर दिखाने के लिए मुखौटे पहन लेते हैं, लेकिन संकट के समय या उनकी अपनी आदतें ही उनकी असलियत दुनिया के सामने ला देती हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि हम जो हैं, वही बनकर रहने में ही हमारी भलाई और सुरक्षा है।

मुख्य कहानी 

बहुत समय पहले की बात है, एक छोटे से गाँव में एक धोबी रहता था। उसके पास एक गधा था, जो बहुत कमजोर और मरियल सा हो गया था। धोबी बहुत गरीब था, इसलिए वह अपने गधे को पेट भर चारा नहीं खिला पाता था। गधा दिन-भर भारी कपड़े ढोता और रात को भूख से तड़पता रहता।

एक दिन, धोबी अपनी गठरी लेकर जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। तभी उसकी नजर झाड़ियों में पड़ी एक चीज पर गई। पास जाकर देखा, तो वह एक मरे हुए शेर की खाल (Skin) थी। खाल को देखते ही धोबी के दिमाग में एक चालाकी भरी योजना आई।

उसने सोचा, 'अगर मैं इस शेर की खाल को अपने गधे के ऊपर ओढ़ा दूँ और रात को उसे किसानों के खेतों में चरने के लिए छोड़ दूँ, तो कोई भी उसे पकड़ने या मारने की हिम्मत नहीं करेगा। सब उसे शेर समझकर डरेंगे और मेरा गधा पेट भर खाना खा सकेगा।'

धोबी उस खाल को घर ले आया। रात होते ही उसने वह खाल गधे को पहना दी। अब वह साधारण गधा नहीं, बल्कि एक खूंखार शेर लग रहा था। धोबी ने उसे पड़ोस के गाँव के एक हरे-भरे खेत की तरफ छोड़ दिया।

जब गधा खेत में घुसा, तो रात को रखवाली कर रहे किसानों की नजर उस पर पड़ी। अंधेरे में शेर की आकृति देखकर उनके होश उड़ गए। वे चिल्लाए, 'भागो! भागो! खेत में शेर आ गया है!' अपनी जान बचाने के लिए सारे किसान लाठी-डंडे छोड़कर अपने घरों में दुबक गए।

अब गधे का राज था। उसने पूरी रात मजे से हरी-हरी फसल खाई और सुबह होने से पहले धोबी के पास वापस आ गया। यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा। गधा रोज रात को शेर बनकर जाता और पेट भरकर वापस आता। अच्छा खाना मिलने से कुछ ही दिनों में गधा हट्टा-कट्टा और मोटा हो गया।

उसकी चाल में भी घमंड आ गया। अब वह खुद को जंगल का राजा समझने लगा था। उसे लगने लगा कि पूरी दुनिया उससे डरती है।

एक पूर्णिमा की रात थी। ठंडी हवा चल रही थी और आसमान में पूरा चाँद खिला हुआ था। गधा खेत के बीचों-बीच खड़ा होकर रसीली फसल का आनंद ले रहा था। उसका पेट भरा हुआ था और वह बहुत खुश था।

तभी, दूर कहीं खेत के बाहर से उसे एक दूसरे गधे के रेंकने की आवाज सुनाई दी।

प्रकृति का नियम है कि अपनी जाति की आवाज सुनकर जानवर प्रतिक्रिया जरूर देते हैं। उस गधे ने जैसे ही अपने साथी की आवाज सुनी, वह भूल गया कि उसने शेर की खाल पहन रखी है और वह भूल गया कि उसे शेर की तरह बर्ताव करना है।

अचानक जोश में आकर उसने अपना मुँह ऊपर उठाया और जोर-जोर से रेंकने लगा, 'ढेंचू! ढेंचू! ढेंचू!'

गाँव के लोग, जो शेर के डर से अपने घरों की छतों पर चढ़कर छिपे हुए थे, उन्होंने जब यह आवाज सुनी तो वे सन्न रह गए।

एक किसान बोला, 'अरे! यह तो शेर की दहाड़ नहीं है। यह तो किसी गधे के रेंकने की आवाज है!' दूसरे किसान ने ध्यान से देखा और कहा, 'अरे हाँ! यह कोई शेर नहीं, बल्कि शेर की खाल ओढ़े एक पाखंडी गधा है जिसने हमारी सारी फसल बर्बाद कर दी।'

सच्चाई पता चलते ही गाँव वालों का डर गुस्से में बदल गया। वे तुरंत अपने मोटे-मोटे डंडे लेकर खेत की तरफ दौड़े।

गधा अभी भी आँखें बंद करके अपनी धुन में रेंक रहा था। उसे पता ही नहीं चला कि कब गाँव वालों ने उसे चारों तरफ से घेर लिया है। जैसे ही उसने आँखें खोलीं, उसने देखा कि लोग गुस्से में उसकी तरफ बढ़ रहे हैं। इससे पहले कि वह भाग पाता, गाँव वालों ने उस पर लाठियों की बरसात कर दी।

पिटाई इतनी जोरदार थी कि शेर की खाल उतरकर गिर गई और उसकी असलियत सबके सामने आ गई। गधे को अपनी मूर्खता और धोबी की चालाकी की भारी कीमत चुकानी पड़ी। वह अधमरा हो गया और अपनी जान बचाकर वहाँ से लंगड़ाता हुआ भागा।

सीख 

यह कहानी हमें यह सिखाती है कि 'दिखावा ज्यादा दिन नहीं चलता और सच्चाई कभी छिपती नहीं है।'

हम चाहे कितने भी अच्छे कपड़े पहन लें या किसी और जैसा बनने का नाटक कर लें, हमारा असली स्वभाव और हमारे गुण कभी न कभी बाहर आ ही जाते हैं। दूसरों को धोखा देकर हम कुछ समय के लिए फायदा उठा सकते हैं, लेकिन अंत में इसका परिणाम अपमान और मुसीबत ही होता है। इसलिए, हम जो हैं, उसी में खुश रहना चाहिए और अपनी असलियत को स्वीकार करना चाहिए।

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