थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद: फिर हुआ युद्धविराम, 18 सैनिकों की रिहाई पर बनी सहमति

थाईलैंड-कंबोडिया सीमा विवाद: फिर हुआ युद्धविराम, 18 सैनिकों की रिहाई पर बनी सहमति

थाईलैंड और कंबोडिया ने शनिवार को एक नए युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस समझौते का उद्देश्य सीमा पर क्षेत्रीय दावों को लेकर कई सप्ताह से चल रहे सशस्त्र संघर्ष को समाप्त करना है। यह समझौता स्थानीय समयानुसार दोपहर 12 बजे से प्रभावी हो गया।

बैंकॉक: दक्षिण–पूर्व एशिया में लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के बीच थाईलैंड और कंबोडिया ने एक बार फिर युद्धविराम पर सहमति जताई है। शनिवार को दोनों देशों के बीच नया सीजफायर समझौता लागू हुआ, जिसका उद्देश्य पिछले कई हफ्तों से जारी सशस्त्र संघर्ष को रोकना है। यह युद्धविराम स्थानीय समयानुसार दोपहर 12 बजे से प्रभावी हो गया। खास बात यह है कि बीते छह महीनों में यह दोनों देशों के बीच चौथा युद्धविराम समझौता है, जो क्षेत्र में जारी अस्थिरता को उजागर करता है।

क्या है नया युद्धविराम समझौता

इस ताजा समझौते के तहत थाईलैंड और कंबोडिया ने सीमा पर तत्काल सभी सैन्य गतिविधियां रोकने, किसी भी तरह के नए हमले से बचने और एक-दूसरे के हवाई क्षेत्र का सैन्य उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल न करने पर सहमति जताई है। समझौते का एक अहम बिंदु यह भी है कि युद्धविराम लगातार 72 घंटे तक प्रभावी रहने की स्थिति में थाईलैंड, पहले पकड़े गए 18 कंबोडियाई सैनिकों को रिहा करेगा।

कंबोडिया के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, इन सैनिकों की वापसी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल थी। इससे पहले शनिवार सुबह तक भी कुछ इलाकों में हमलों की खबरें सामने आई थीं, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि हालात कितने नाजुक बने हुए थे।

20 दिनों तक चली ताजा झड़प

हालिया संघर्ष लगभग 20 दिनों तक चला, जिसमें सीमा से सटे कई इलाकों में भारी तनाव देखने को मिला। इस दौरान हवाई हमलों का आरोप खास तौर पर थाईलैंड पर लगा। कंबोडिया का कहना है कि उसके कुछ सैन्य ठिकानों और सीमावर्ती क्षेत्रों को निशाना बनाया गया, जबकि थाईलैंड ने अपने कदमों को सुरक्षा कारणों से उठाया गया बताया।

नए युद्धविराम में दोनों देशों ने जुलाई में हुए पिछले समझौतों का भी पालन करने की प्रतिबद्धता दोहराई है। जुलाई में पांच दिन तक चले संघर्ष को समाप्त करने के लिए जो सीजफायर हुआ था, वह भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता का नतीजा था। हालांकि, उन समझौतों के बावजूद सीमा पर छिटपुट हिंसा और आरोप–प्रत्यारोप जारी रहे, जो अंततः दिसंबर की शुरुआत में बड़े संघर्ष में बदल गए।

जुलाई में ट्रंप की भूमिका रही अहम

जुलाई में हुआ पहला बड़ा युद्धविराम मलेशिया की मध्यस्थता से संभव हो पाया था। उस समय अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी अहम भूमिका निभाई थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप ने दोनों देशों को चेतावनी दी थी कि यदि वे सीजफायर पर सहमत नहीं होते हैं तो व्यापारिक रियायतें रोकी जा सकती हैं। इसके बाद अक्टूबर में मलेशिया में हुए एक क्षेत्रीय सम्मेलन में इन समझौतों को और औपचारिक रूप दिया गया, जिसमें ट्रंप भी शामिल हुए थे।

विशेषज्ञों का मानना है कि थाईलैंड–कंबोडिया सीमा विवाद की जड़ें ऐतिहासिक और क्षेत्रीय दावों में हैं, जिन्हें अब तक स्थायी समाधान नहीं मिल पाया है। यही कारण है कि दोनों देश बार-बार युद्धविराम पर सहमत तो हो जाते हैं, लेकिन कुछ ही समय बाद हालात फिर बिगड़ जाते हैं। राजनीतिक बयानबाजी, सैन्य तैनाती और आपसी अविश्वास इस तनाव को और बढ़ा देता है।

 

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